ग्राम टुडे ख़ास

रूहानी रिश्ते

कुन्दन कुमारी
ट्रेन में बैठे बैठे बंशी बहुत थक चुका था पर मन ही मन बहुत खुशी था क्योंकि वह एक साल पर प्रदेश से घर वापस हो रहा था ।अपने जेब से फोन निकाला और अपनी पत्नी सरला से बोला कि अब स्टेशन आने ही वाली है मैं स्टेशन पर उतर कर नाश्ता कर लूंगा क्योंकि बस से घर पहूंचने में कम से कम दो घंटा तो लग ही जाएगा ।इतने में ही ट्रेन स्टेशन पर रुकी बंशी अपने सामान को संभालते हुए स्टेशन पर उतरा फिर हाथ मुंह धोकर बैग से खाने का सामान निकाला।
बंशी जहां खाने के लिए बैठा था उसके बिल्कुल सामने ही जानकी देवी बैठ कर रो रही थी ,बंसी की नजर बार-बार उधर जाती ,उससे रहा नहीं गया वह जाकर जानकी देवी से पूछा मां जी कहां तक जाएंगी?
मुझे पता नहीं कि कहां जाना है ?उदास होकर जानकी देवी बोली –
आपके साथ कौन है मां जी? बंशी पूछा। जानकी देवी क्रोधित होकर बोली ?
कोई नहीं है मेरे साथ दुनिया में कोई किसी का नहीं है सिर्फ स्वार्थ का है ।अब बंशी के अंदर जानने की उत्सुकता बढ़ गयी, खाना को आगे बढ़ाते हुए बोला मां जी खाना खाएंगी । जानकी देवी फफक कर रोने लगी बेटा दो दिन से खाना नहीं खाई हूं कल ही मेरा बेटा यहां बैठा दिया और बोला कि ट्रेन का पता कर के आते हैं पर अब तक वापस नहीं आया है। घर में तो कलह होते ही रहता था, गाली गलौज से लेकर मारपीट भी होती थी पर दो शाम में एक शाम भी तो खाना मिल जाता था सोने के लिए जमीन भी तो मिल जाती थी अब मैं क्या करूंगी ? कहां जाऊंगी? आंख से दिखाई भी नहीं देता हाथ पैर भी ठीक से काम नहीं कर रहा है मेरा जीवन अब कैसे चलेगा । जानकी देवी के इस बातों को सुनकर बंशी की आंखें डबडबा गई भावूक होते हुए कहा कि सौभाग्यशाली व्यक्ति को ही मां का प्यार मिलता है मैं तो जान भी नहीं पाया मां का प्यार । मेरे जन्म के समय ही मेरी मां मुझे छोड़कर स्वर्ग चली गई है आप मेरे साथ चलेंगे माँ जी मुझे मां मिल जाएगी और आपको बेटा । कुंती देवी निराशा भरी शब्दों में बोली बेटा ऐसा कहीं हुआ है जिसको अपने खून से सींच कर जन्म दी, प्रसव की असहनीय पीड़ा को सही दूसरे के घर चौका चूल्हा कर पालन पोषण की। मेहनत मजदूरी करके पढ़ाई लिखाई पूरा करवाई । मेरे पति तो बहुत पहले ही गुजर चुके थे पर मैं कभी उसे पिता का अभाव खलने नहीं दिया ,जब वह मेरा नहीं हुआ तो दूसरा कौन हो सकता है ।वंशी जानकी देवी को विश्वास दिलाते हुए कहा मां जी कुछ रिश्ते खून के रिश्ते से भी गहरे होते हैं ।जानकी देवी बंशी की आंखों में सच्चाई देखकर बंशी के साथ चलने के लिए तैयार हो गई बंशी जानकी देवी के साथ बस में बैठ घर के लिए रवाना हुए। इधर सरला बहुत देर से बंशी का इंतजार कर रही थी बंशी ज्योंही दरवाजा पर पहुंचा ,सरला से कहा देखो मेरी मां मेरे साथ आई है सरला को समझने में देर ना लगी बोली सासू मां के बिना तो यह घर ही बेकार था । झट से जानकी देवी को प्रणाम की जानकी देवी बंशी और सरला को पाकर धन्य हुई और खुशी पूर्वक जीवन जीने लगी।
कुन्दन कुमारी
समाजिक कार्यकर्ता
बेगूसराय, बिहार

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