ग्राम टुडे ख़ास

वैवाहिक वर्षगांठ पर तारकेश्वर राय “तारक” के विचार

बदलाव की आँधी ने सब पर अपना असर दिखाया है चाहे वो परम्पराएं हो रिश्ते हो सँस्कृति हो, कुछ भी तो अछूता नही रहा । जड़ हो चाहे चेतन, सब के सर चढ़ बोल रहा है बदलाव।

हाँ,बदलाव का असर किसी पर कम दिख रहा है, किसी पर अधिक । वक्त के साथ रिश्तों के मायने भी बदले है, बदल रहे हैं और मतलब भी, आज उसका अर्थ वो नही रहा जिसे सोचकर पुरखों ने कभी इसकी नीव रखी थी।

दिखावे का चोला पहन रिश्ता अब बस मतलब के ही रह गए हैं। अमीर के तो सभी अपने ही हैं, गरीब जानता है उसको पूछने वाले तो बिरले ही मिलेंगे बन्धु । तुलसी बाबा ने तो सदियों पहले हमे आगाह करते हुए लिख गए “सुर नर मुनि सब कै यह रीती । स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।।”।

सनातन धर्म मे विवाह को जीवन के एक अनिवार्य ‘संस्कार’ के रूप में मान्यता दी, इसके पीछे पुरखों की कूछ सोच तो अवश्य रही होगी। भले आज इसके मायने बदल गए, लेकिन अनिवार्यता अभी तक कायम है।

विवाह के बारे में समाज एवम परिवार का कड़ा रवैया कुम्हार की तरह स्त्री-पुरुषों को परिवाररूपी घड़े के आकार में ढाल रहा है। अनिवार्यता व मर्यादाओं के नाम पर उसके हाथों के द्वारा दी जाने वाली चोट ही, आज इस घड़े को सही आकार में ढाल रही है।

आज उसी विवाह संस्कार को तीन दशक से भी ज्यादा हो गए । लगता है कल की ही बात है आज ही के दिन अर्थात 6 जून को 31 साल पहले, दो अंजानो ने एक साथ जिन्दगी की राह में आगे बढ़ने के लिए एक दूसरे का हाथ पकड़ा था, बैवाहिक स्थिति वाले कॉलम में बदलाव आया था। समय ने हमारे दाम्पत्य जीवन रूपी बगिया मे तीन फूल खिलाये। हमेशा जी तोड़ कोशिश रही कि समाजिक एवम परिवारिक दायित्व अच्छी तरह निभ जाय, किसी की आत्मा न दुखे, साथी का साथ मिला रास्ता आसान हो गया।

जैसा कि हर मध्यम वर्गीय के साथ होता है, तो मेरे साथ भी वही हुआ,कुछ अलग नही हुआ, जिन्दगी ने जमकर धैर्य की परीक्षा ली, आर्थिक अभाव ने कस कर झिंझोड़ा, रिश्तों ने खट्टे मीठे अनुभव का स्वाद चखाया। अपनो ने हाथ छुड़ाया तो गैरो ने मजबूती के साथ हाँथ पकड़ा। गाड़ी चलती रही, हर इन्सान को अपने हिस्से की लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ती है, जीवन की सच्चाई भी यही है। दुख सुख के किनारों से टकराकर आगे बढ़ना ही जिन्दगी है।

भाग्यशाली हूँ जीवनसाथी का सदैव साथ मिला, अभाव परेशानी में भी कोई गीला शिकवा नहीं, जो मिला उसी में खुश, सबको खुश रखने की कोशिश। आज है वो कल नहीं होगा, आज पर ही कल टिका है इसको सवारे कल अपने आप सवरेगा। शिक्षा एवम सँस्कार से ही बच्चों की जिन्दगी बनेगी, इसके लिए हमेशा प्रयासरत, पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़े होने के बाद ही बच्चों को दाम्पत्य जीवन में बाँधा जाय। इसी सकारात्मक सोच के साथ आज भी हम जी तोड़ कोशिश कर रहे है, सफर जारी है। आगे प्रभु इच्छा।

मई जून का महीना ही हमारे समय शादी के लिए नियत था, इसलिए इसी माह अधिकतर शादी की सालगिरह है। इसी भीड़ के हिस्से हम भी है,हम भी आपके स्नेह के आकांक्षी है।

जीवन जो कट गया वो उत्तम था, उसके लिए परवरदिगार का शुक्रगुजार हैं हम । जीवनसाथी के सौगात के लिए बाबा विश्वनाथ का तहे दिल से आभार। बाकी आप तो अन्तर्यामी हो प्रभु, क्या कहूँ ? आगे भी ठीक से ही काट देना मालिक।
तारकेश्वर राय “तारक”
गुरुग्राम, हरियाणा

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