ग्राम टुडे ख़ास

शिक्षा के पथ पर अग्रसर वाल्मीकि समाज की शिक्षिकाएंं

  • शिक्षा, साहित्य व समाजसेवा के क्षेत्र में शिक्षिकाओं के बढ़ते कदम! पूर्व राष्ट्रपति एवं प्रथम उपराष्ट्रपति, दार्शनिक, महान शिक्षाविद्य डाॅ.सर्वपल्ली राधा कृष्णन जी के जन्मदिवस को भारत देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस शिक्षक दिवस पर वाल्मीकि समाज में जन्मी शिक्षिकाएं जो समाज का नाम रोशन कर रही हैं उनके विषय में बहुत शोध करने के बाद यह महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है जो मुझे अपने समाज तक पहुंचाने में बड़ा गर्व महसूस हो रहा है। यूं तो दलित समाज में विशेषतः महिलाओं में शिक्षा की अलख जगाने वाली भारत देश की प्रथम शिक्षिका, त्याग, बलिदान एवं तपस्या की मूर्ति माता सावित्रीबाई फुले का नाम सर्वोपरि है। इन्होंने उस दौर में शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया जब सामान्य वर्ग की महिलाएं भी शिक्षा से वंचित रहती थी। बाबा साहब डाॅ.भीमराव अम्बेडकर एवं माता सावित्री बाई फुले की विरासत को आगे बढ़ाते हुए वाल्मीकि समाज में जन्मीं अनेकों क्रान्तिकारी सामाजिक शिक्षिकाएं अपने क्षेत्र में अपने स्तर पर समाज में शिक्षा का प्रकाश फैला रही हैं। अपनी-अपनी योग्यता के दम पर वंचित समाज में शिक्षा की लो जलाकर विशेषतः समाज की बेटियों के लिए पथ प्रदर्शक का कार्य भी कर रही हैं। जनपद, राज्य, देश-विदेश तक शिक्षिकाओं ने विपरीत परिस्थितियों में समाज में शिक्षा, साहित्य व समाजसेवा के माध्यम से सकारात्मक वातावरण का संदेश देने का भी कार्य किया है। समाज में जन्मी बेटियों का शिक्षित होना उसके विवेक का जगना समाज में नव जागरण शिक्षा की क्रान्ति को जन्म देता है। इस शिक्षक दिवस पर ज्ञान के प्रतीक बाबा साहब डाॅ.भीमराव अम्बेडकर एवं महिलाओं में शिक्षा क्रान्ति की जनक माता सावित्री बाई फुले के क्रान्तिकारी विचारों को अपने जीवन में आत्मसात एवं अनुसरण कर वाल्मीकि समाज में शिक्षा का परचम लहराने वाली शिक्षिकाएं समाज के धरातल पर स्वयं माध्यम बनकर महिलाओं के लिए विशेष पहचान बन रही है। समाज में लम्बे अरसे से प्राथमिक, जूनियर, इण्टर काॅलेज, डिग्री काॅलेज एवं विश्वविद्यालय स्तर पर देश की भावी पीढ़ी एवं विशेषतः महिलाओं को शिक्षा के पथ पर मार्गदर्शित एवं पल्लवित करने को इन्होंने अपने जीवन में महत्वपूर्ण स्थान दिया है। जहां एक ओर देश के नवनिर्माण से लेकर राजनीति, शिक्षा, साहित्य तक मुकाम प्राप्त किया है वहीं देश के दबे-कुचले, शोषित, पीड़ित, दलित एवं वंचित समाज की इन महिलाओं ने अपनी योग्यता, अनुभव, बड़ों के आर्शीवाद एवं वक्त के पहिये का आंकलन कर दलित समाज ही नहीं सर्वसमाज में अपनी योग्यता का लोहा मनवाया है। आज उसी की बदौलत यह शिक्षिकाएं सर्वसमाज में सम्मान के साथ शिक्षा जागरण, सेमिनार, वेबिनार, राष्ट्रीय स्तर तक के कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि, काउंसलर, एवं गाईड के रूप में भी आमंत्रित की जाती हैं। वाल्मीकि समाज के लिए यह बड़े ही गौरव का विषय है कि आज हमारी माँ, बहन, बेटी समाज की दलदल से बाहर निकलकर दलित समाज ही नहीं वरन सर्वसमाज में शिक्षा की रोशनी फैलाकर शिक्षा की राह दिखा रही हैं। भावी पीढ़ी से यह आशा है कि इन प्रतिष्ठित एवं प्रसिद्ध शिक्षिकाओं का अनुसरण करते हुए इस विरासत को समाज में आगे बढ़ाती रहे। जिससे समाज भविष्य में शिक्षा के क्षेत्र में पथ प्रदर्शक बना रहे। महाराष्ट्र राज्य के जनपद नागपुर निवासी वरिष्ठ दलित साहित्यकार, सेठ केसरीमल पोरवाल काॅलेज, कामठी में हिन्दी की सेवानिवृत्त शिक्षिका डाॅ.सुशीला टाकभौरे का नाम ऐसा प्रसिद्ध एवं विख्यात नाम है जो श्रीलंका, लंदन, दुबई सहित भारत के विभिन्न राज्यों में नारी के व्यक्तित्व का परचम लहराकर हर सम्भव साहित्य-समाज-शिक्षा के क्षेत्र में नारी के उत्थान एवं विकास के लिए लगभग 4 दशकों से समाज का नाम रोशन कर रही हैं। दलित समाज एवं महिलाओं के उत्पीड़न से सम्बन्धित दर्जनों पुस्तकों का सफल लेखन करने वाली दो विषयों में एम.ए., बी.एड, हिन्दी साहित्य में पी.एच.डी. (अज्ञेय के कथा साहित्य में नारी) उच्च शिक्षित 4 मार्च 1954 को जन्मी डाॅ.सुशीला टाकभौरे के व्यक्तित्व एवं कृत्तिव पर भी दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और कई विश्वविद्यालयों में इनके साहित्य जीवन पर शोध कार्य किये जा चुके हैं। भारतीय महिलाओं की प्रेरणास्रोत डाॅ.सुशीला टाकभौरे की लेखनी दलित उत्पीड़न एवं नारी जीवन के ईर्द-गिर्द घुमती है इनकी कलम का मुख्य केन्द्र भारतीय पीड़ित नारी की दशा-दिशा, उत्पीड़न, अन्याय, जुल्म-जयादती, संघर्ष, दलन, शोषण आदि नारी की विभिन्न समस्याओं का अपनी विभिन्न विधाओं में वर्णन करती है। समाज में शिक्षा को सर्वोपरी स्थान दिलाने के लिए देश-विदेश तक अपनी बुलन्द आवाज के दम पर भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर भी अपनी वार्ताओं का प्रसारण कर चुकी डाॅ.सुशीला टाकभौरे का साहित्य वर्तमान में कई राज्यों के बोर्ड एवं विश्वविद्यालय स्तर तक की पुस्तकों में संलग्न है। देश के बड़े पुरस्कारों से सम्मानित सौम्य, सादगी, सरलता की प्रतिमूर्ति डाॅ. सुशीला जी अपने आप में एक विरासत हैं, एक शख्सियत हैं, अमूल्य धरोहर हैं, महत्वपूर्ण विचारों की संग्रहकर्ता हैं, दलित साहित्य के लिए शोध हैं। वाल्मीकि समाज में जन्मी ऐसी महान विभूति हमारे लिए गौरव है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ से जूनियर स्कूल से वीआरएस प्राप्त शिक्षिका पुष्पा वाल्मीकि का जन्म 1 अक्टूबर 1956 को हुआ। बीए व बीटीसी शिक्षा प्राप्त पुष्पा वाल्मीकि दलित समाज में क्रान्ति की अग्रदूत बनकर स्वच्छकार समुदाय की विभिन्न समस्याओं के निराकरण के लिए दिन-रात तत्पर रहती हैं। अम्बेडकरवादी विचारधारा की रोशनी में कई दशकों से कार्य कर रही पुष्पा वाल्मीकि दलित महिलाओं के लिए भी चिंतित नजर आती हैं। समाजसेवा को सर्वोपरी मानने वाली पुष्पा वाल्मीकि ने वर्ष 2003 में समाज की खायी को पाटने के लिए जूनियर हाईस्कूल की शिक्षिका से त्याग पत्र दे दिया था। वर्ष 2000 में तेहरान में आयोजित एशिया पेसिफिक कमेटी की बैठक में भागीदारी की एवं भारत के विभिन्न राज्यों में दलित समाज एवं महिलाओं के लिए कार्य कर रही पुष्पा वाल्मीकि अम्बेडकर मिशन एवं दलित सशक्तीकरण नेतृत्व विकास एवं गतिविधियों के लिए राष्ट्रीय स्तर के संगठनों के साथ जुड़कर नये आयाम स्थापित कर रही हैं। उत्तराखण्ड के पं.गो.व.पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कैम्पस के पन्तनगर इण्टर काॅलेज, पन्तनगर में इतिहास की प्रवक्ता उत्तराखण्ड गौरव डाॅ.राधा वाल्मीकि पाँच विषयों में परास्नातक, बीएड, एलएलबी, पीएचडी डिग्री राजनीतिशास्त्र (उत्तराखण्ड के अधीनस्थ न्यायालयों में कार्य प्रद्धति एवं विकास) प्राप्त समाजसेविका, कवयित्री होने के साथ-साथ हिमालय वुडबैज (स्काउटिंग) उच्च शिक्षा प्राप्त शिक्षा, समाजसेवा एवं साहित्य के क्षेत्र में सैकड़ों राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं। 12 अगस्त 1964 को उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ा में जन्मी डाॅ. राधा वाल्मीकि अपने संघर्षमय जीवन के बलिदान को समाज के लिए समर्पित करने को हर सम्भव तैयार रहती हैं। अफ्रीका से प्रकाशित विश्व की 101 द मोस्ट इंस्पायरिंग प्यूपल आफ अर्थ बुक में विश्व की प्रसिद्ध हस्तियों के साथ इनकी भी जीवनी प्रकाशित हो चुकी है। विरली हस्तियों में शुमार डाॅ.राधा वाल्मीकि जमीन से जुड़ी हुई कठिन परिश्रमी, मेहनतकश, ईमानदार व प्रतिष्ठित समाज सेविका एवं कवयित्री हैं। साहित्य में विशेष स्थान रखने वाली डाॅ. राधा वाल्मीकि की वार्ताएं आकाशवाणी केन्द्र पर प्रसारित होती रहती हैं। शिक्षा, साहित्य व समाजसेवा के क्षेत्र में वाल्मीकि समाज का नाम रोशन कर रही डाॅ. राधा वाल्मीकि जैसी विरले हस्तियाँ समाज में कम ही पैदा होती हैं। दिल्ली से श्यामलाल काॅलेज शाहदरा में हिन्दी की एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ.सुमित्रा मेहरोल का जन्म 21 जून 1965 को दिल्ली में हुआ। डाॅ.सुमित्रा मेहरोल एमए, एमफिल एवं पी.एच.डी हिन्दी विषय में नागार्जुन के उपन्यासों में लोकतत्व विषय पर है। आकाशवाणी दिल्ली से परिचर्चा, वार्ता कहानी भी प्रसारित हो चुकी हैं। देश के बड़े साहित्यकारों में शुमार डाॅ. सुमित्रा मेहरोल साहित्य और समसामयिक गतिविधियों पर आधारित राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाले सेमिनार, कांफ्रेंस इत्यादि में वक्ता के रूप में भागीदारी भी करती हैं। बचपन में पोलियों हो जाने के कारण अपने पैरों से काफी परेशान रहती थी फिर भी इन्होंने विपरीत परिस्थितियों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर समाज में एक मुकाम हासिल किया। दिल्ली से मोतीलाल नेहरू काॅलेज दिल्ली में संस्कृत की असिस्टेंट प्रोफेसर डाॅ.कौशल पंवार का जन्म 10 अक्टूबर 1977 को कैथल के हरियाणा में हुआ। डाॅ.कौशल पंवार एमए, एमफिल, पीएचडी संस्कृत विषय में प्राप्त हैं। बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर को आर्दश मानने वाली डाॅ. कौशल पंवार, बाॅलिवुड अभिनेता आमिर खान के प्रसिद्ध टीवी धारावाहिक सत्यमेव जयते में भी समाज की वास्तविकता के दर्पण के पहलू का दर्द बयां कर चुकी हैं। देश-विदेश में बड़े सम्मान के साथ डाॅ. कौशल पंवार का नाम शैक्षिक, सामाजिक एवं साहित्यिक मंचों पर लिया जाता है और इन्हें कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाकर विशेषतः महिलाओं एवं दलित वर्ग को शिक्षा समानता के अधिकार के तौर पर बुलाया जाता है। समाज की जमीनी स्थिति को जनता के सम्मुख उजागर करने के लिए डाॅ.कौशल पंवार के लेख एवं साक्षात्कार देश के विभिन्न समाचार पत्र/पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। उत्तर प्रदेश के बरेली से हिन्दी की एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. सुषमा गोडियाल रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय बरेली में कार्यरत हैं। 18 अप्रैल 1969 को जन्मी डाॅ. सुष्मा गोडियाल एमए, प्रभाकर, विशारद, पीएचडी हिन्दी विषय में साहित्यकार डाॅ.रामकुमार वर्मा की काव्य रचनाओं का अनुशीलन पर है। वर्ष 2004 से लगातार शिक्षा के पथ पर चल कर समाज में शिक्षा का प्रकाश फैला रही डाॅ.सुष्मा गोडियाल की आकाशवाणी केन्द्रों पर अपनी काव्य रचनाएं एवं वार्ताए प्रासारित होती रहती हैं। साहित्य में विशेष रूचि रखते हुए डाॅ. सुष्मा गोडियाल जी समाज में एक सम्मानित नाम है। उत्तराखण्ड के राजकीय महाविद्यालय मालधन चौड़ नैनिताल में प्राचार्या के पद को सुशोभित कर रही डाॅ.सुशीला सूद एमए, बीएड, एमएड, पीएचडी हिन्दी विषय में मुक्ति बोध के साहित्य में प्रगतिशील चेतना पर है। 28 जून 1962 को जन्मी डाॅ. सुशीला सूद उच्च शिक्षा के क्षेत्र में वाल्मीकि समाज में एक ऐसा प्रतिष्ठित व सम्मानित नाम हैं इनके परिवार में पांच पीएचडी हैं। शिक्षा के क्षेत्र में प्रचार-प्रसार के लिए ईमानदारी, निष्ठा एवं तत्परता से समाज में दशकों से प्रयासरत हैं। शिक्षा उत्थान के लिए आए निमंत्रण पर दूर-दराज तक शिक्षा के पथ को प्रकाशित कर रही डाॅ.सुशीला सूद समाज में महिलाओं के लिए एक पुष्पित व पल्लवित नाम है। दिल्ली के बी.आर. काॅलेज दिल्ली विश्वविद्यालय के अन्तर्गत कोलेज में अतिथि अध्यापक के पद पर कार्यरत डाॅ. पूनम तुषामढ़ का पीएचडी हिन्दी विषय में हिन्दी दलित साहित्य में जनतांत्रिक मूल्यों का अध्ययन पर आधारित है। 8 अप्रैल 1975 को जन्मी डाॅ. पूनम तुषामढ़ के दो एकल काव्य संग्रहों एवं गद्य में महत्वपूर्ण योगदान रखते हुए देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं आलेख आदि प्रकाशन के साथ-साथ पत्र-पत्रिकाओं में संपादक अतिथि संपादक के दायित्व का निर्वाह भी कर चुकी हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न काॅलेज में अतिथि प्रोफेसर के तौर पर पढ़ा चुकी डाॅ. पूनम तुषामढ़ दलित साहित्य में महिला रचनाकारों में उभरता हुआ नाम हैं। दर्जनों साझा संग्रहों में इनकी रचनाएं, शोध पत्र, लेख विशेष स्थान रखते है। विभिन्न साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में अपनी योग्यता एवं अनुभव के साथ विशेष पहचान बनाकर डाॅ.पूनम तुषामढ़ ने समाज में महिलाओं के लिए एक नया मुकाम स्थापित किया है। उत्तराखण्ड के एस.एस.जे. विश्वविद्यालय अल्मोड़ा में एजुकेशन विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डाॅ.संगीता पंवार का जन्म 11 नवम्बर 1983 को हुआ। एमएससी (वनस्पति विज्ञान), एमए राजनीतिशास्त्र, पीएचडी उच्च शिक्षित डाॅ. संगीता पंवार के विभिन्न शोध पत्र ऐतिहासिक ग्रन्थों में प्रकाशित होते रहते हैं। अपने समाज के लिए सेवा में तत्पर डाॅ.संगीता पंवार जमीनी स्तर पर शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए पूरी टीम के साथ कार्य कर रही हैं। अल्मोड़ा विश्वविद्यालय में एक उभरता हुआ ऐसा नाम हैं जो समय-समय पर उच्च स्तर पर बड़े सेमिनारों के माध्यम से समाज को शिक्षा की राह दिखाने का कार्य करती हैं। कुमाउं विश्वविद्यालय में एनएसएस अधिकारी, प्रवेश बोर्ड में सदस्य, विश्वविद्यालय प्रोक्टर बोर्ड में सदस्य जैसे महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हो चुकी डाॅ. संगीता पंवार के जन्म लेने से उच्च शिक्षा प्राप्त करने से समाज में शिक्षा का उजियारा हुआ है। उत्तराखण्ड के देहरादून डी.ए.वी.इण्टर काॅलेज में शिक्षिका डाॅ.बबीता सहोत्रा दो विषयों में एमए, बीएड पीएचडी राजनीति शास्त्र में उत्तराखण्ड में वंचित वर्ग राजनीति विषलेषणात्मक अध्ययन विषय प्राप्त उत्तराखण्ड की सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्र में प्रमुख स्थान रखती हैं। 8 जनवरी 1972 को जन्मी डाॅ. बबीता सहोत्रा 22 वर्ष की उम्र से ही नगर पालिका परिषद देहरादून की सभासद बनकर परिषद की उपाध्यक्ष, वार्ड, नगर, क्षेत्र, मण्डल प्रदेश तक भाजपा के विभिन्न पदों पर भी रह चुकी हैं। नशा मुक्ति आन्दोलन, शिक्षा काउंसलर गरीब लड़कियों का विवाह कराना, वृद्धाओं व विधाओं की पेंशन बनवाना समाज में शिक्षा के विभिन्न आयाम स्थापित कर रही हैं। हर वर्ष समाज के बच्चों के विकास उत्थान के लिए विभिन्न आंदोलनों में प्रमुख भूमिका निभाकर समाज में एकता का परिचय देती है। हरियाणा के जीवन चानना महिला महाविद्यालय असंघ करनाल में हिन्दी की प्रोफेसर डाॅ.सुरेखा 8 सितम्बर 1982 को जन्मी की शिक्षा एमए, एमफिल, पीएचडी हिन्दी में दलित साहित्य विषय पर है। देश की वरिष्ठ दलित साहित्यकारों के निर्देशन में कार्य कर चुकी, दलित साहित्य एवं नारी शक्ति पर अपने विभिन्न लेखों के माध्यम से एवं समाज में जमीनी स्तर पर शिक्षा के लिए संघर्षरत एवं प्रयासरत डाॅ.सुरेखा हरियाणा क्षेत्र में महिलाओं में एक उभरता नाम है जो अपने स्तर पर अपने क्षेत्र में अपने स्वयं के दम पर युवा पीढ़ी में शिक्षा के प्रति रक्त का संचार करती हैं। ऐसी बेटियों के जन्म से वाल्मीकि समाज गौरवान्वित है। एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ.प्रेमलता चुटेल, एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. नीता सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर डा.सुदेश चन्देल, असिस्टेंट प्रोफेसर श्रीमती संजू बाला, असिस्टेंट प्रोफेसर डा.रेणू चढ़्डा, शिक्षिका श्रीमती सुधा वैद्य, शिक्षिका श्रीमती सरिता सिंह, शिक्षिका हंसा बागरे, शिक्षिका रेखा सहदेव, शिक्षिका राजेश रानी इनके अलावा भी समाज में और ऐसी विभिन्न प्रतिभाएं हैं जो अपने-अपने स्तर पर अपनी योग्यता के दम पर समाज में शिक्षा की क्रान्ति की मशाल को लेकर शिक्षा के प्रकाश को धरातल पर उकेरती हैं। परन्तु अभी उनके विषय में जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी। समाज की ऐसी मात्र शक्ति जो विश्व पटल पर भारत के नवनिर्माण में अपना सहयोग एवं समर्पण कर रही हैं उन्हें लेखक की कलम नमन करती है…। लेखक- आशीष भारती लेखक/कवि/समीक्षक (प्रशासनिक सहायक: फार्मेसी काॅलेज बड़ूली, सहारनपुर) मो.7830262142, 7668418588सहारनपुर – 247001 (उ.प्र.)शिक्षा, साहित्य व समाजसेवा के क्षेत्र में शिक्षिकाओं के बढ़ते कदम!

पूर्व राष्ट्रपति एवं प्रथम उपराष्ट्रपति, दार्शनिक, महान शिक्षाविद्य डाॅ.सर्वपल्ली राधा कृष्णन जी के जन्मदिवस को भारत देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस शिक्षक दिवस पर वाल्मीकि समाज में जन्मी शिक्षिकाएं जो समाज का नाम रोशन कर रही हैं उनके विषय में बहुत शोध करने के बाद यह महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है जो मुझे अपने समाज तक पहुंचाने में बड़ा गर्व महसूस हो रहा है। यूं तो दलित समाज में विशेषतः महिलाओं में शिक्षा की अलख जगाने वाली भारत देश की प्रथम शिक्षिका, त्याग, बलिदान एवं तपस्या की मूर्ति माता सावित्रीबाई फुले का नाम सर्वोपरि है। इन्होंने उस दौर में शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया जब सामान्य वर्ग की महिलाएं भी शिक्षा से वंचित रहती थी। बाबा साहब डाॅ.भीमराव अम्बेडकर एवं माता सावित्री बाई फुले की विरासत को आगे बढ़ाते हुए वाल्मीकि समाज में जन्मीं अनेकों क्रान्तिकारी सामाजिक शिक्षिकाएं अपने क्षेत्र में अपने स्तर पर समाज में शिक्षा का प्रकाश फैला रही हैं। अपनी-अपनी योग्यता के दम पर वंचित समाज में शिक्षा की लो जलाकर विशेषतः समाज की बेटियों के लिए पथ प्रदर्शक का कार्य भी कर रही हैं। जनपद, राज्य, देश-विदेश तक शिक्षिकाओं ने विपरीत परिस्थितियों में समाज में शिक्षा, साहित्य व समाजसेवा के माध्यम से सकारात्मक वातावरण का संदेश देने का भी कार्य किया है। समाज में जन्मी बेटियों का शिक्षित होना उसके विवेक का जगना समाज में नव जागरण शिक्षा की क्रान्ति को जन्म देता है।
इस शिक्षक दिवस पर ज्ञान के प्रतीक बाबा साहब डाॅ.भीमराव अम्बेडकर एवं महिलाओं में शिक्षा क्रान्ति की जनक माता सावित्री बाई फुले के क्रान्तिकारी विचारों को अपने जीवन में आत्मसात एवं अनुसरण कर वाल्मीकि समाज में शिक्षा का परचम लहराने वाली शिक्षिकाएं समाज के धरातल पर स्वयं माध्यम बनकर महिलाओं के लिए विशेष पहचान बन रही है। समाज में लम्बे अरसे से प्राथमिक, जूनियर, इण्टर काॅलेज, डिग्री काॅलेज एवं विश्वविद्यालय स्तर पर देश की भावी पीढ़ी एवं विशेषतः महिलाओं को शिक्षा के पथ पर मार्गदर्शित एवं पल्लवित करने को इन्होंने अपने जीवन में महत्वपूर्ण स्थान दिया है। जहां एक ओर देश के नवनिर्माण से लेकर राजनीति, शिक्षा, साहित्य तक मुकाम प्राप्त किया है वहीं देश के दबे-कुचले, शोषित, पीड़ित, दलित एवं वंचित समाज की इन महिलाओं ने अपनी योग्यता, अनुभव, बड़ों के आर्शीवाद एवं वक्त के पहिये का आंकलन कर दलित समाज ही नहीं सर्वसमाज में अपनी योग्यता का लोहा मनवाया है। आज उसी की बदौलत यह शिक्षिकाएं सर्वसमाज में सम्मान के साथ शिक्षा जागरण, सेमिनार, वेबिनार, राष्ट्रीय स्तर तक के कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि, काउंसलर, एवं गाईड के रूप में भी आमंत्रित की जाती हैं। वाल्मीकि समाज के लिए यह बड़े ही गौरव का विषय है कि आज हमारी माँ, बहन, बेटी समाज की दलदल से बाहर निकलकर दलित समाज ही नहीं वरन सर्वसमाज में शिक्षा की रोशनी फैलाकर शिक्षा की राह दिखा रही हैं। भावी पीढ़ी से यह आशा है कि इन प्रतिष्ठित एवं प्रसिद्ध शिक्षिकाओं का अनुसरण करते हुए इस विरासत को समाज में आगे बढ़ाती रहे। जिससे समाज भविष्य में शिक्षा के क्षेत्र में पथ प्रदर्शक बना रहे।
महाराष्ट्र राज्य के जनपद नागपुर निवासी वरिष्ठ दलित साहित्यकार, सेठ केसरीमल पोरवाल काॅलेज, कामठी में हिन्दी की सेवानिवृत्त शिक्षिका डाॅ.सुशीला टाकभौरे का नाम ऐसा प्रसिद्ध एवं विख्यात नाम है जो श्रीलंका, लंदन, दुबई सहित भारत के विभिन्न राज्यों में नारी के व्यक्तित्व का परचम लहराकर हर सम्भव साहित्य-समाज-शिक्षा के क्षेत्र में नारी के उत्थान एवं विकास के लिए लगभग 4 दशकों से समाज का नाम रोशन कर रही हैं। दलित समाज एवं महिलाओं के उत्पीड़न से सम्बन्धित दर्जनों पुस्तकों का सफल लेखन करने वाली दो विषयों में एम.ए., बी.एड, हिन्दी साहित्य में पी.एच.डी. (अज्ञेय के कथा साहित्य में नारी) उच्च शिक्षित 4 मार्च 1954 को जन्मी डाॅ.सुशीला टाकभौरे के व्यक्तित्व एवं कृत्तिव पर भी दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और कई विश्वविद्यालयों में इनके साहित्य जीवन पर शोध कार्य किये जा चुके हैं। भारतीय महिलाओं की प्रेरणास्रोत डाॅ.सुशीला टाकभौरे की लेखनी दलित उत्पीड़न एवं नारी जीवन के ईर्द-गिर्द घुमती है इनकी कलम का मुख्य केन्द्र भारतीय पीड़ित नारी की दशा-दिशा, उत्पीड़न, अन्याय, जुल्म-जयादती, संघर्ष, दलन, शोषण आदि नारी की विभिन्न समस्याओं का अपनी विभिन्न विधाओं में वर्णन करती है। समाज में शिक्षा को सर्वोपरी स्थान दिलाने के लिए देश-विदेश तक अपनी बुलन्द आवाज के दम पर भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर भी अपनी वार्ताओं का प्रसारण कर चुकी डाॅ.सुशीला टाकभौरे का साहित्य वर्तमान में कई राज्यों के बोर्ड एवं विश्वविद्यालय स्तर तक की पुस्तकों में संलग्न है। देश के बड़े पुरस्कारों से सम्मानित सौम्य, सादगी, सरलता की प्रतिमूर्ति डाॅ. सुशीला जी अपने आप में एक विरासत हैं, एक शख्सियत हैं, अमूल्य धरोहर हैं, महत्वपूर्ण विचारों की संग्रहकर्ता हैं, दलित साहित्य के लिए शोध हैं। वाल्मीकि समाज में जन्मी ऐसी महान विभूति हमारे लिए गौरव है।
उत्तर प्रदेश के लखनऊ से जूनियर स्कूल से वीआरएस प्राप्त शिक्षिका पुष्पा वाल्मीकि का जन्म 1 अक्टूबर 1956 को हुआ। बीए व बीटीसी शिक्षा प्राप्त पुष्पा वाल्मीकि दलित समाज में क्रान्ति की अग्रदूत बनकर स्वच्छकार समुदाय की विभिन्न समस्याओं के निराकरण के लिए दिन-रात तत्पर रहती हैं। अम्बेडकरवादी विचारधारा की रोशनी में कई दशकों से कार्य कर रही पुष्पा वाल्मीकि दलित महिलाओं के लिए भी चिंतित नजर आती हैं। समाजसेवा को सर्वोपरी मानने वाली पुष्पा वाल्मीकि ने वर्ष 2003 में समाज की खायी को पाटने के लिए जूनियर हाईस्कूल की शिक्षिका से त्याग पत्र दे दिया था। वर्ष 2000 में तेहरान में आयोजित एशिया पेसिफिक कमेटी की बैठक में भागीदारी की एवं भारत के विभिन्न राज्यों में दलित समाज एवं महिलाओं के लिए कार्य कर रही पुष्पा वाल्मीकि अम्बेडकर मिशन एवं दलित सशक्तीकरण नेतृत्व विकास एवं गतिविधियों के लिए राष्ट्रीय स्तर के संगठनों के साथ जुड़कर नये आयाम स्थापित कर रही हैं।
उत्तराखण्ड के पं.गो.व.पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कैम्पस के पन्तनगर इण्टर काॅलेज, पन्तनगर में इतिहास की प्रवक्ता उत्तराखण्ड गौरव डाॅ.राधा वाल्मीकि पाँच विषयों में परास्नातक, बीएड, एलएलबी, पीएचडी डिग्री राजनीतिशास्त्र (उत्तराखण्ड के अधीनस्थ न्यायालयों में कार्य प्रद्धति एवं विकास) प्राप्त समाजसेविका, कवयित्री होने के साथ-साथ हिमालय वुडबैज (स्काउटिंग) उच्च शिक्षा प्राप्त शिक्षा, समाजसेवा एवं साहित्य के क्षेत्र में सैकड़ों राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी हैं। 12 अगस्त 1964 को उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ा में जन्मी डाॅ. राधा वाल्मीकि अपने संघर्षमय जीवन के बलिदान को समाज के लिए समर्पित करने को हर सम्भव तैयार रहती हैं। अफ्रीका से प्रकाशित विश्व की 101 द मोस्ट इंस्पायरिंग प्यूपल आफ अर्थ बुक में विश्व की प्रसिद्ध हस्तियों के साथ इनकी भी जीवनी प्रकाशित हो चुकी है। विरली हस्तियों में शुमार डाॅ.राधा वाल्मीकि जमीन से जुड़ी हुई कठिन परिश्रमी, मेहनतकश, ईमानदार व प्रतिष्ठित समाज सेविका एवं कवयित्री हैं। साहित्य में विशेष स्थान रखने वाली डाॅ. राधा वाल्मीकि की वार्ताएं आकाशवाणी केन्द्र पर प्रसारित होती रहती हैं। शिक्षा, साहित्य व समाजसेवा के क्षेत्र में वाल्मीकि समाज का नाम रोशन कर रही डाॅ. राधा वाल्मीकि जैसी विरले हस्तियाँ समाज में कम ही पैदा होती हैं।
दिल्ली से श्यामलाल काॅलेज शाहदरा में हिन्दी की एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ.सुमित्रा मेहरोल का जन्म 21 जून 1965 को दिल्ली में हुआ। डाॅ.सुमित्रा मेहरोल एमए, एमफिल एवं पी.एच.डी हिन्दी विषय में नागार्जुन के उपन्यासों में लोकतत्व विषय पर है। आकाशवाणी दिल्ली से परिचर्चा, वार्ता कहानी भी प्रसारित हो चुकी हैं। देश के बड़े साहित्यकारों में शुमार डाॅ. सुमित्रा मेहरोल साहित्य और समसामयिक गतिविधियों पर आधारित राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाले सेमिनार, कांफ्रेंस इत्यादि में वक्ता के रूप में भागीदारी भी करती हैं। बचपन में पोलियों हो जाने के कारण अपने पैरों से काफी परेशान रहती थी फिर भी इन्होंने विपरीत परिस्थितियों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर समाज में एक मुकाम हासिल किया।
दिल्ली से मोतीलाल नेहरू काॅलेज दिल्ली में संस्कृत की असिस्टेंट प्रोफेसर डाॅ.कौशल पंवार का जन्म 10 अक्टूबर 1977 को कैथल के हरियाणा में हुआ। डाॅ.कौशल पंवार एमए, एमफिल, पीएचडी संस्कृत विषय में प्राप्त हैं। बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर को आर्दश मानने वाली डाॅ. कौशल पंवार, बाॅलिवुड अभिनेता आमिर खान के प्रसिद्ध टीवी धारावाहिक सत्यमेव जयते में भी समाज की वास्तविकता के दर्पण के पहलू का दर्द बयां कर चुकी हैं। देश-विदेश में बड़े सम्मान के साथ डाॅ. कौशल पंवार का नाम शैक्षिक, सामाजिक एवं साहित्यिक मंचों पर लिया जाता है और इन्हें कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाकर विशेषतः महिलाओं एवं दलित वर्ग को शिक्षा समानता के अधिकार के तौर पर बुलाया जाता है। समाज की जमीनी स्थिति को जनता के सम्मुख उजागर करने के लिए डाॅ.कौशल पंवार के लेख एवं साक्षात्कार देश के विभिन्न समाचार पत्र/पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं।
उत्तर प्रदेश के बरेली से हिन्दी की एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. सुषमा गोडियाल रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय बरेली में कार्यरत हैं। 18 अप्रैल 1969 को जन्मी डाॅ. सुष्मा गोडियाल एमए, प्रभाकर, विशारद, पीएचडी हिन्दी विषय में साहित्यकार डाॅ.रामकुमार वर्मा की काव्य रचनाओं का अनुशीलन पर है। वर्ष 2004 से लगातार शिक्षा के पथ पर चल कर समाज में शिक्षा का प्रकाश फैला रही डाॅ.सुष्मा गोडियाल की आकाशवाणी केन्द्रों पर अपनी काव्य रचनाएं एवं वार्ताए प्रासारित होती रहती हैं। साहित्य में विशेष रूचि रखते हुए डाॅ. सुष्मा गोडियाल जी समाज में एक सम्मानित नाम है।
उत्तराखण्ड के राजकीय महाविद्यालय मालधन चौड़ नैनिताल में प्राचार्या के पद को सुशोभित कर रही डाॅ.सुशीला सूद एमए, बीएड, एमएड, पीएचडी हिन्दी विषय में मुक्ति बोध के साहित्य में प्रगतिशील चेतना पर है। 28 जून 1962 को जन्मी डाॅ. सुशीला सूद उच्च शिक्षा के क्षेत्र में वाल्मीकि समाज में एक ऐसा प्रतिष्ठित व सम्मानित नाम हैं इनके परिवार में पांच पीएचडी हैं। शिक्षा के क्षेत्र में प्रचार-प्रसार के लिए ईमानदारी, निष्ठा एवं तत्परता से समाज में दशकों से प्रयासरत हैं। शिक्षा उत्थान के लिए आए निमंत्रण पर दूर-दराज तक शिक्षा के पथ को प्रकाशित कर रही डाॅ.सुशीला सूद समाज में महिलाओं के लिए एक पुष्पित व पल्लवित नाम है।
दिल्ली के बी.आर. काॅलेज दिल्ली विश्वविद्यालय के अन्तर्गत कोलेज में अतिथि अध्यापक के पद पर कार्यरत डाॅ. पूनम तुषामढ़ का पीएचडी हिन्दी विषय में हिन्दी दलित साहित्य में जनतांत्रिक मूल्यों का अध्ययन पर आधारित है। 8 अप्रैल 1975 को जन्मी डाॅ. पूनम तुषामढ़ के दो एकल काव्य संग्रहों एवं गद्य में महत्वपूर्ण योगदान रखते हुए देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं आलेख आदि प्रकाशन के साथ-साथ पत्र-पत्रिकाओं में संपादक अतिथि संपादक के दायित्व का निर्वाह भी कर चुकी हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न काॅलेज में अतिथि प्रोफेसर के तौर पर पढ़ा चुकी डाॅ. पूनम तुषामढ़ दलित साहित्य में महिला रचनाकारों में उभरता हुआ नाम हैं। दर्जनों साझा संग्रहों में इनकी रचनाएं, शोध पत्र, लेख विशेष स्थान रखते है। विभिन्न साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में अपनी योग्यता एवं अनुभव के साथ विशेष पहचान बनाकर डाॅ.पूनम तुषामढ़ ने समाज में महिलाओं के लिए एक नया मुकाम स्थापित किया है।
उत्तराखण्ड के एस.एस.जे. विश्वविद्यालय अल्मोड़ा में एजुकेशन विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डाॅ.संगीता पंवार का जन्म 11 नवम्बर 1983 को हुआ। एमएससी (वनस्पति विज्ञान), एमए राजनीतिशास्त्र, पीएचडी उच्च शिक्षित डाॅ. संगीता पंवार के विभिन्न शोध पत्र ऐतिहासिक ग्रन्थों में प्रकाशित होते रहते हैं। अपने समाज के लिए सेवा में तत्पर डाॅ.संगीता पंवार जमीनी स्तर पर शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए पूरी टीम के साथ कार्य कर रही हैं। अल्मोड़ा विश्वविद्यालय में एक उभरता हुआ ऐसा नाम हैं जो समय-समय पर उच्च स्तर पर बड़े सेमिनारों के माध्यम से समाज को शिक्षा की राह दिखाने का कार्य करती हैं। कुमाउं विश्वविद्यालय में एनएसएस अधिकारी, प्रवेश बोर्ड में सदस्य, विश्वविद्यालय प्रोक्टर बोर्ड में सदस्य जैसे महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हो चुकी डाॅ. संगीता पंवार के जन्म लेने से उच्च शिक्षा प्राप्त करने से समाज में शिक्षा का उजियारा हुआ है।
उत्तराखण्ड के देहरादून डी.ए.वी.इण्टर काॅलेज में शिक्षिका डाॅ.बबीता सहोत्रा दो विषयों में एमए, बीएड पीएचडी राजनीति शास्त्र में उत्तराखण्ड में वंचित वर्ग राजनीति विषलेषणात्मक अध्ययन विषय प्राप्त उत्तराखण्ड की सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्र में प्रमुख स्थान रखती हैं। 8 जनवरी 1972 को जन्मी डाॅ. बबीता सहोत्रा 22 वर्ष की उम्र से ही नगर पालिका परिषद देहरादून की सभासद बनकर परिषद की उपाध्यक्ष, वार्ड, नगर, क्षेत्र, मण्डल प्रदेश तक भाजपा के विभिन्न पदों पर भी रह चुकी हैं। नशा मुक्ति आन्दोलन, शिक्षा काउंसलर गरीब लड़कियों का विवाह कराना, वृद्धाओं व विधाओं की पेंशन बनवाना समाज में शिक्षा के विभिन्न आयाम स्थापित कर रही हैं। हर वर्ष समाज के बच्चों के विकास उत्थान के लिए विभिन्न आंदोलनों में प्रमुख भूमिका निभाकर समाज में एकता का परिचय देती है।
हरियाणा के जीवन चानना महिला महाविद्यालय असंघ करनाल में हिन्दी की प्रोफेसर डाॅ.सुरेखा 8 सितम्बर 1982 को जन्मी की शिक्षा एमए, एमफिल, पीएचडी हिन्दी में दलित साहित्य विषय पर है। देश की वरिष्ठ दलित साहित्यकारों के निर्देशन में कार्य कर चुकी, दलित साहित्य एवं नारी शक्ति पर अपने विभिन्न लेखों के माध्यम से एवं समाज में जमीनी स्तर पर शिक्षा के लिए संघर्षरत एवं प्रयासरत डाॅ.सुरेखा हरियाणा क्षेत्र में महिलाओं में एक उभरता नाम है जो अपने स्तर पर अपने क्षेत्र में अपने स्वयं के दम पर युवा पीढ़ी में शिक्षा के प्रति रक्त का संचार करती हैं। ऐसी बेटियों के जन्म से वाल्मीकि समाज गौरवान्वित है।
एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ.प्रेमलता चुटेल, एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. नीता सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर डा.सुदेश चन्देल, असिस्टेंट प्रोफेसर श्रीमती संजू बाला, असिस्टेंट प्रोफेसर डा.रेणू चढ़्डा, शिक्षिका श्रीमती सुधा वैद्य, शिक्षिका श्रीमती सरिता सिंह, शिक्षिका हंसा बागरे, शिक्षिका रेखा सहदेव, शिक्षिका राजेश रानी इनके अलावा भी समाज में और ऐसी विभिन्न प्रतिभाएं हैं जो अपने-अपने स्तर पर अपनी योग्यता के दम पर समाज में शिक्षा की क्रान्ति की मशाल को लेकर शिक्षा के प्रकाश को धरातल पर उकेरती हैं। परन्तु अभी उनके विषय में जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी। समाज की ऐसी मात्र शक्ति जो विश्व पटल पर भारत के नवनिर्माण में अपना सहयोग एवं समर्पण कर रही हैं उन्हें लेखक की कलम नमन करती है…।

लेखक-
आशीष भारती
लेखक/कवि/समीक्षक
(प्रशासनिक सहायक: फार्मेसी काॅलेज बड़ूली, सहारनपुर)
मो.7830262142, 7668418588सहारनपुर – 247001 (उ.प्र.)

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