ग्राम टुडे ख़ास

संतुष्ट हूं

दीपिका चौहान

आज सफलता के शिखर तक पहुंची नहीं हूं,
सफलता के सफर को तय कर रही हूं,
पर तब भी मैं संतुष्ट हूं।
अपने हर लिबास से, अपने ठाठ-बाठ से ,
मैं संतुष्ट हूं।

चार चांद झुके नहीं हैं,
प्राण यह मेरे थके नहीं हैं।
पर फिर भी संतुष्ट हूं। हूं भरे समंदर के मझधार में,
किनारे की तालाश में,
और गर्मी के मौसम के सूरज की आस में,
अभी तक आषाढ़ गया नहीं है ,
मुश्किलों से भरा जाड़ गया नहीं है।
खुशियों से भरे कंबल अभी तक खरीदे नहीं हैं,
पर उस सूरज की रोशनी से ही सही, आज मैं संतुष्ट हूं।

आज फिर भी कुछ कार्य स्थगित करने पड़ रहे हैं,
खुद का इतिहास रचा नहीं है,कलम अभी तक मिलें नहीं हैं।
पर तब भी मैं संतुष्ट हूं।
उस जादूई कलम के ना मिलने से ही सही,
काले-नीले कलमों से डायरियां लिख कर ही सही, पर आज मैं संतुष्ट हूं।
संतुष्ट हूं इस दुनिया में रहकर ही , खुश हूं अपने अंदाज से ही ,आज इस बात से ही सही पर मैं संतुष्ट हूं, आज मैं संतुष्ट हूं।।

दीपिका चौहान
जशपुर, छत्तीसगढ़ ।

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