ग्राम टुडे ख़ास

साहित्यानुशासन के प्रणेता हैं अमर नाथ “अमर्त्य”

डॉ अवधेश कुमार अवध

साहित्य एक पावन सोच का ही तो नाम है। साहित्य का बीज अक्षय होता है। बस एक बार हृदय में पहुँचना चाहिए। प्रायः देखा जाता है कि इसका बीज किसी की भी हृदय-रसा में, कभी भी, और किसी भी उम्र में अंकुरित हो जाता है। न इसे किसी पेशे से परहेज है, न किसी परिवेश से गुरेज। जरा सी अनुकूलता मिली भी प्रस्फुटन शुरु। चाहे राज दरबार हो या मोची का जूताखाना या कि कसाई की कत्लगाह। यह हर जगह स्पृश्य है, पावन है, सुंदर है, सुग्राह्य है। आज हम इन समस्त विशेषताओं के धनी एक ऐसे साहित्यकार की चर्चा करेंगे जिनका लोहा सहस्त्रों साहित्य प्रेमी मानते हैं। जिसके आशीष से दो पीढ़ियाँ साहित्य के प्रांगण में रम रही हैं। जिसकी सीख से छंद नये कलेवर में नव पीढ़ी तक हस्तांतरित हो रहे हैं। जिसका स्नेह हर कुंजवासी को सहज ही सुलभ है। जी हाँ, हमारे छंदगुरु आ. अमर नाथ अमर्त्य जी।

अस्सी वर्षीय अजर-अमर सेवा निवृत्त अभियंता जिनकी लेखनी छंदबद्ध, छंदमुक्त एवं गद्य जैसी विविध विधाओं में भी समान अधिकार से न केवल चलती है बल्कि दूसरों को भी चलना सिखाती है। खण्ड काव्य, चुटकी (द्विपदी हास्य – व्यंग्य संग्रह), कहानियाँ, व्यंग्य, भजन, गजल, गीत, छंद सागर, दोहा गाथा, सहयोगी रचनाकार के रूप में 28 साझा संग्रह, 4 पुस्तकों का संपादन तथा छः प्रकाश्य पुस्तकें एवं सात दर्जन समीक्षाओं की विपुल संपदा के सर्जक हैं आ. अमर्त्य जी। साहित्य के क्षेत्र में इनके उत्कृष्ट योगदान को देखते हुए दहाई अंकों में सरकारी, गैरसरकारी सम्मान से सम्मानित किया गया है। इनसे इतर हजारों साहित्य प्रेमी दिन-प्रतिदिन अपने निश्छल प्रेम से इन्हें पुरस्कृत करते हैं। नूतन साहित्य कुंज ने पहले ही इन्हें “अमर्त्य” मान लिया है।

आ. अमर नाथ अमर्त्य जी का रचना संसार जितना व्यापक है उससे अधिक वैविध्य भी। भक्ति, श्रृंगार एवं शांत रस की प्रधानता में प्रतिष्ठित छंदों से लेकर अत्याधुनिक छंदों में और यदा-कदा छंद मुक्त या अकविता में भी उल्लेखनीय सृजन करते हैं। नये उपमान का प्रयोग बेहिचक करते हैं। एक शेर द्रष्टव्य है-

“कमल पर बैठी हैं, अमर, भौरों की टोलियाँ।
जब भी देखूँ उनकी आँखों का काजल दिखाई दे।”

एक कवि सदैव समाज की जिम्मेदारी के प्रति सजग रहता है। वर्तमान में कोरोना नामक महामारी ने कवि एवं कविता का रुख मोड़ दिया। सामाजिक एवं पारिवारिक दायित्व को सोशल डिस्टेंसिंग के रूप में नया प्रतिमान मिला। उदाहरणार्थ-

“कुछ तुम सरको, कुछ हम सरकें,
बस छह फुट दूरी बची रहे।
हम, आओ दोनों प्यार करें,
बस मास्क मुँह पर तनी रहे।।”

वाचिक परम्परा से लेखन में आई द्विपदी चुटकी का जिक्र करना बहुत जरूरी है। हास्य-व्यंग्य उपजाती इस तरह की रचना का एक उदाहरण द्रष्टव्य है-

“खाकर, किसमिश।
करती ‘किस’, ‘मिस’।।”

आ. अमर नाथ अमर्त्य जी ने अगणित विधाओं एवं विविध विषयों पर लेखनी चलायी और अनवरत चला भी रहे हैं। साहित्य को सदैव समाज का दर्पण बनाने की दुरूह साधना करते हैं। दोहा छंद में भक्तिरस से संपृक्त यह सृजन देखना समीचीन होगा-

“प्रभु इच्छा कुछ और है, तू चाहत कछु और।
चाहत है कुछ और तू, पावत है कछु और।।
सोचत है कुछ और तू, होवत है कछु और।
करता है कुछ और तू, मिलता है कछु और।।”

इस तरह आ. अमर नाथ अमर्त्य जी के संबंध में जितना भी कहा जाए, सूर्य के समक्ष प्रभाकीट से अधिक नहीं होगा। उनके विपुल रचना संसार से कुछ चुनिंदा रचनाओं और उनके बारे में स्वयं के अनुभव के आधार पर कुछ कहने का यह प्रयास मात्र है, दूसरे शब्दों में दुस्साहस है। नूतन साहित्य कुंज में आपकी एवं अद्वितीय छंदगुरु की भूमिका अवर्णनीय, अक्षय एवं स्मरणीय है। ईश्वर आपको स्वस्थ, समृद्ध, कीर्तिवान एवं चिरायु रखें।

डॉ अवधेश कुमार अवध
8787573644

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