ग्राम टुडे ख़ास

सृजन से संहार की ओर

ख़ुशबू पाण्डेय

कभी कभी शब्दों के साथ साथ इरादे भी मज़बूत कर लेने चाहिए क्यूंकि अपनी तुच्छ ज़रूरतों और इच्छाओं के लिए यदि आप अपने ही शब्दों पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं डटे नहीं रह पा रहे हैं तो आप भी तमाम सामाजिक अपराधों और बुराइयों में बराबर के भागीदार हैं…. जो भी करें ये देखने और समझने के बाद ही करें कि आप जो कर रहे हैं उस कृत्य की गिनती सामाजिक बुराई या कुरीतियों में होती है या जनहित में।
अपने चश्मों पर लगी धूल ज़रा साफ़ करके देखिए सब साफ़ नज़र आएगा कि सब ऐसा ही चलता है ऐसा ही होता है की आड़ में हम अनिष्ट कर बैठे हैं, प्रत्येक क्षण हम कारण बन रहे हैं अपने ही दु:खों का और बढ़ रहे हैं सृजन से संहार की ओर…

  • ख़ुशबू पाण्डेय, लखनऊ
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