ग्राम टुडे ख़ास

हम तमाशबीन


राकेश चन्द्रा
विगत दिनों मीडिया में एक खबर बार-बार देखकर हृदय द्रवित हो उठा। उड़ीसा के किसी सुदूर गाँव का रहने वाला एक व्यक्ति अपनी पत्नी के शव को अपने कंधों पर उठाये काफी दूर तक पैदल चला क्योंकि शव को ले जाने के लिये अस्पताल में एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं थी। यह दृश्य निश्चय ही भीतर तक झकझोरने वाला था। फिर कुछ समय के अन्तराल पर देश के अन्य हिस्सों से भी ऐसी घटनाओं की जानकारी हुई। प्रशासनिक व्यवस्था की लाचारी तो जगजाहिर है और समय-समय पर सरकारों द्वारा कमियों को दूर करने के प्रयास भी किये जाते रहे हैं, भले ही उनमें पर्याप्त गंभीरता का अभाव रहा हो। पर उक्त दृश्य में जो बात खटकती है वह यह कि जब वह व्यक्ति अपनी पत्नी को कंधे पर रखकर ले जा रहा था तो रास्ते में कई स्थानों पर लोग तमाशबीन की तरह देख रहे थे। संभव है कि उनमें से कई लोग उसके प्रति सहानुभूति भी व्यक्त कर रहे होंगे तो दूसरे सरकार एवं सरकारी तंत्र को कोस रहे होंगे। हमारे देश में यह आम दृश्य है। ऐसी तमाम घटनाएँ होती हैं जिसमें राह चलते लड़कियों से छेड़छाड़ किया जाता है या कोई बदमाश व्यक्ति भीड़-भाड़ वाली जगहों में भी आराम से किसी को जान से मारकर चला जाता है और भीड़ आराम से खड़ी ताकती रहती है!
क्या हमारा देश तमाशबीनों का देश नहीं बनता जा रहा है जहाँ के नागरिक अपने दायित्वों एवं कर्तव्यों को भूल चुके हैं? प्रथम दृश्य में यदि तमाशबीन लोग अपने दायित्व का पालन करते हुए गरीब ग्रामवासी के लिये किसी वाहन का प्रबन्ध मिलकर कर देते तो अपनी पत्नी के शव को कंधों पर लादकर ले जाने की स्थिति न उत्पन्न होती! वास्तव में यह दृश्य न केवल वहाँ के निवासियों बल्कि पूरी मानव जाति के मुँह पर एक करारा प्रहार है। अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों को भुलाकर हर समय सरकार एवं शासन-प्रशासन को कोसते रहना हमारी नियति बन चुकी है। हम लोग इतने गरीब भी नहीं हैं कि थोड़े लोग आपस में चंदा करके शव को सम्मानपूर्वक गंतव्य स्थल पर ले जाने के लिये एक अदद वाहन का भी प्रबन्ध न कर सकें! पर सोच की संकीर्णता से ऊपर उठना हमें अभी सीखना हैं। इसी प्रकार सरे राह किसी बदमाश को या उसके दो-चार साथियों को अपने दुष्कर्मों की सजा के लिये पुलिस के सुपुर्द करना भीड़ में खड़े होकर तमाशा देखने वालों के लिये कोई कठिन कार्य नहीं हैं। कुछ लोग हिम्मत दिखायें तो अपराध करने वाले भागने में ही खैर समझते हैं। वैसे भी ऐसे लोग कायरों की श्रेणी में आते हैं और उनका आत्म विश्वास भी बहुत जल्दी डिगता है, पर हम मूकदर्शक की तरह खड़े होकर महिलाओं, बुजुर्गों, बच्चों एवं समाज के अन्य कमजोर वर्गों के प्रति दिन-प्रतिदिन होने वाले अनाचारों एवं दुष्कर्मों को मात्र इसलिये घटित होने देते हैं कि शायद एक शानदार विरासत के होते हुए भी हम नागरिक के रूप में अपने कर्तव्यों एवं दायित्वों को लगभग भूल चुके हैं। हाँ, कभी हमारे अपने जब असामाजिक तत्वों का शिकार बनते हैं तब हमें दर्द महसूस होता है। सरकारी तंत्र को कोसने से समस्या का समाधान नहीं निकलेगा। जिस देश में जागरूक एवं अपने कर्तव्यों के प्रति नागरिक सजग होते हैं, वहाँ का तंत्र भी तदनुरूप सजग रहता है। हमें अच्छे एवं जागरूक नागरिक बनने की ओर ठोस कदम उठाना होगा और यह कार्य बिना देर किये प्रारम्भ करना होगा। तभी हम अपने देश और अपनी माटी का ऋण चुका सकेंगे।
राकेश चन्द्रा

610/60, केशव नगर कालोनी

सीतापुर रोड, लखनऊ

उत्तर-प्रदेश-226020

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