ग्राम टुडे ख़ास

हे मातृभूमि तूझे नमन

श्रीकांत यादव

अनुभूति की कल्पना में
संवेगों की संवेदना के
अथाह गहराइयों में उतर
अनंत गोंते लगाता हूं
कुछ चेतन में
कुछ अवचेतन में
तैरने लगता हूं
भावनाओं के ज्वार भाटे में
तैरती तिरती यादों संग
अनंत गहराइयों के समुंदर में!

डूबता उतराता
यादों की डुबकियां लगाता
बड़ी देर तक एकाग्र
सोचता हूँ कई बार
क्या रहा नाता तुमसे
हे पालनहारी तपोभूमिं
हे करुणाधारी वपोभूमिं
हे रजों से वारी जन्मभूमिं
हां तुम्ही से हे मातृभूमिं!

छोड़ दिया दुलार कर
त्याग दिया क्यों पालकर
इस कर्मभूमिं के हाथों
जिसके हवाले हूं
बहुत दौड़ लगवाती है
रगेदती है दुत्कार कर
न जाने किसकी किसकी
अनचाही मनुहार में
दिखावे के प्यार में !

सब समय का फेर है
जहां एक एक पल में देर है
यहां भागती है जिंदगी
सोती तो बहुत कम
जागती है जिंदगी
जैसे साधती है जिंदगी
यहाँ जिंदगियों में रेस है
यहाँ हर बात एक केस है
इंसानियत है कमजोर
यहाँ पैसा ही शेष है
हां कुछ कारण विशेष है!

थकान है यहाँ मानवता में
ड़र है यहाँ भाईचारे में
यहाँ खोने का ही नहीं
न पाने का भी गम है
यहाँ हांकती है जिंदगी
यहां हांफती है जिंदगी
डर से कांपती है जिंदगी
सबका कद नापती है जिंदगी
यहां सोशल जस्टिस का दावा है
लेकिन सामाजिकता बेदम है!

ऐसे में तुम्हारे यादों की
कल्पनाओं का सहारा है
मातृभूमि तुम्हारी लाचारी थी
मुझको क्यों वारी थी
दोष किस मुँह से दूं
कर्मभूमि कितनी प्रिय सी हो
जिंदगी को सहारा देती
अंतरंग एक प्रेयसी हो
लेकिन तुम जन्मदात्री माँ
भली निर्धन ही सही
पालनहारी श्रेयसी हो!

ऐसे में सोचता हूँ
तुम्हारे हिस्से का प्यार
तुम्हारे ममता दुलार का
मोल क्या चुका पाऊंगा
क्या लौटकर आ पाऊंगा
दूध का मोल किसी से चुका नहीं
यह कैसे चुका पाऊंगा
बस तेरा वैभव अक्षुण्य रहे माँ
जिंदगी की बिसात कितनी
पानी के बुलबुले जैसा
टिपटिपाती बूंदों से बनना
फिर इसी से बिगड़ना
या कलियों जैसा
खिलना महकना मुरझाना बस
इंसान भी कितना है बेबस
लेकिन मिलेंगे हे मातृभूमि
मन को थोड़ा सा समझाना
तुझे भूल सकूँ
ऐसा होता तो
न होता आगमन
आऊंगा करुंगा आचमन
हे मातृभूमि तुझे नमन!

श्रीकांत यादव
(प्रवक्ता हिंदी)
आर सी 326, दीपक विहार
खोड़ा, गाजियाबाद
उ०प्र०

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