ग्राम टुडे ख़ास

हे स्त्री

नीलम राकेश

हे स्त्री,
क्यों चाहिए,
अवलंबन तुम्हें ?
क्यों है प्रतीक्षा
किसी की ?

हे स्त्री,
सुनो आहट
इन पदचापों की,
यह आहट है
युग परिवर्तन की ।

हे स्त्री,
पहचानो
खुद को और
बन जाओ तुम
स्वयंसिद्धा ।

है जो
प्यासी नदी,
भीतर तुम्हारे,
उसकी तुम
रसधार बनो ।

हे स्त्री,
निकलो तुम
देहरी के पार,
कर लो तुम
पूरे हर अरमान ।

क्योंकि,
तुम हो
शक्तिरूपा,
और हों
इस युग की पहचान !!

नीलम राकेश
लखनऊ

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