ग्राम टुडे ख़ास

ख़्वाब

प्रीति शर्मा असीम

ख़्वाब आंखों में ही टूट जाते है।
जिंदगी ऐसे भी दिन दिखाती है।
इंसान सोचता तो बहुत कुछ है।
लेकिन जिंदगी कभी -कभी,
मझधार बनकर आती है।

ख़्वाब आंखों में ही टूट जाते है।
जिंदगी की हकीकतें भी बहुत बेरहम है।
सब्र से भी कहाँ मंजिलें मिल पाती है।
ख़्वाब बुनते ही रह जाते है।
पांव के नीचें से हकीकतें निकल जाती है।

ख़्वाब आंखों में ही टूट जाते है।
ख़्वाब देखने में कहां हर्ज है।
इनकी कोई कीमत कहां होती है।
शायद इसीलिये सिर्फ ख्यालों में दर्ज होती है।
ख़्वाब बस आंखों में ही ना रह जायें।
और जिंदगी मौत से बहुत आगे निकल जाती है।
स्वरचित मौलिक रचना –
प्रीति शर्मा असीम
नालागढ़, हिमाचल प्रदेश

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