ग्राम टुडे ख़ास

ग़ज़ल

अवनीश त्रिवेदी ‘अभय’

मियां कुछ यूँ शराफ़त कर रहे हो।
हमीं से बस अदावत कर रहे हो।

चला जाऊँ तुम्हारे इस शहर से।
बताओ क्यों हिफ़ाजत कर रहे हो?

दुआओं में असर होता नही है।
पता कैसी इबादत कर रहे हो?

जखम तो ख़ूब दानिस्ता दिया है।
मग़र फ़िर भी शिक़ायत कर रहे हो।

अमीरी मिल गई तो भूल बैठे।
हमीं पर बादशाहत कर रहे हो।

उमर भर पालता तुमको रहा जो।
उसी से अब बग़ावत कर रहे हो।

भरोसा अब ‘अभय’ कैसे करेंगे?
मुहब्बत की तिज़ारत कर रहे हो।

अवनीश त्रिवेदी ‘अभय’

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