ग्राम टुडे ख़ास

“आसान नहीं परदेश गमन”

भावना ठाकर
कदमों में हौसलों की परवाज़ भरे, आँखों में सपने हज़ार लिए, जेब में चंद सिक्कों की बौछार लिए और दिल में अपनों का प्यार लिए जब जाता है परदेश कोई पुरुष तब कितना कुछ पीछे छोड़ जाता है अपना।
घर की दहलीज़, दरों दीवार, घर का आँगन, पिता की छत्रछाया, माँ की ममता, भाई बहन का दुलार, पत्नी का बेशुमार प्यार और चाय की किटली पर गप्पें लड़ाने वाले जिगर जान दोस्तों की मर मिटने वाली यारियाँ, तो कोई अपनी माशुका भी छोड़ जाता है। जब जाता है पुरुष देश छोड़ कर तब पीछे मुस्कान छोड़ जाता है और अकेलापन साथ लिए निकल पड़ता है। उसे भी तो लुभाता है अपनी सरज़मीं का सरमाया, कहाँ जाना चाहता है छोड़ कर अपनी संस्कृति का खजाना। पर जब भूख की तपिश भ्रमित करती है, ख़्वाहिशें जरूरत के साथ सौदा करती है और परिवार को सुखों की सौगात देने की चाहत पनपती है दिल में तब अपने हुनर को गिरवी रखता है पुरुष परदेशी उद्योगों की नींव में अपना पसीना सिंचकर, सात समुन्दर पार अकेले जूझते झेलता है वक्त की मार। जब भूख से बेहाल होता है तब नहीं होती वहाँ माँ के हाथ की गर्म रोटी, ना होता है खिलाने वाला हाथ, आहत होता है जब ज़िंदगी की चुनौतियों से तब नहीं होता वहाँ कोई पीठ पर हाथ पसारकर अपनापन जताने वाला पिता का हाथ, तब पिता की सौहार्दपूर्ण पनाह को ढूँढता है। भूख उठती है प्रेम को पाने की तब नहीं मिलता काँधा पत्नी का प्रेम सभर। बिमार होता है तब पीड़ से अकेले लड़ता है, सेवा सुश्रृसा के लिए नहीं होता कोई अपना आस-पास। कहाँ देख पाता है परदेश गया पिता अपने बच्चों को बड़ा होते हुए, तरस जाता है लम्हें-लम्हें को जब बच्चों की याद आती है बेपनाह तब परदेश गया पुरुष चार आँसूं भी बहा लेता है। त्योहारों में मना रहा होता है जब देश में परिवार जश्न तब विदेश में बैठा पुरुष अकेलेपन की कगार पर बैठे दो पेग लगाकर मुस्कुरा लेता है और विडियो काॅल पर भारी मन से सबसे मिलकर ऑफ़ कैमरा सबको मिस करते सुबक भी लेता है।
नहीं मिलते नौकर-चाकर परदेश में पानी का ग्लास तक खुद भरकर जिसने नहीं पीया वो कपड़े भी धो लेता है, झाडू भी लगा लेता है और बर्तन भी मांज लेता है। मशीन बन जाता है मर्द दिनरथ की धुरी पर दौड़ते, फिर भी देखता है जब गाँव में बसे परिवार को सुख साह्यबी में खेलते तब संतुष्टि की बौछार में नहाते रीढ़ पर पड़े ज़ख़्मों को भूल जाता है।
जरूरी नहीं परदेश की ज़मीं सोना ही उगलती हो, घरबार छोड़कर गए पुरुष के पसीने की नमी कथीर को सोने में बदलती है तब जाकर परिवार की फ़सल लहलहाती है। यहाँ सबको लगता है भाई परदेश में ऐश कर रहा है, कोई नहीं जानता कैश को कमाने के चक्कर में ऐश गुम हो जाता है संघर्षों की गर्द में। देश में रहे या परदेश में ज़िंदगी ही मर्दों की संघर्ष की परिभाषा रही है।
ऐश तो देश वालों की होती है, शाम होते ही खुद को अपनों की आगोश में पाते है, परदेशी को कहाँ नसीब अपनों की नज़दीकियों का सुख। बस यादों की बौछार में नहाते अश्कों से बहते खारे आँसूओं को पीना होता है। पंख फैला कर गया कोई पंछी वापस भी मूड़ता है तो कोई वहीं का होकर रह जाता है। भले अपना लिया हो परदेश का चलन फिर भी दिल तो बंदे का हिन्दुस्तानी ही रहता है हरदम।
(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

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