ग्राम टुडे ख़ास

अतिक्रमण एक विकृत सोच

राकेश चंद्रा

 आजकल शहरों में सड़कों को चैड़ा करने का कार्य आवश्यकता के आधार पर यत्र-तत्र देखने को मिल जाता है। दिनोंदिन बढ़ता हुआ ट्रैफिक शायद इसका एक प्रमुख कारण है। सड़कों के चैड़ी होने से निःसन्देह सड़क से गुजरने वाले  लोगों को राहत मिलती है। सड़क दुर्घटनाओं की संभावनाओं में भी कमी होगी, ऐसा परिकल्पित किया जाता है जो तार्किक दृष्टिकोण से उचित भी है। पर महानगरों मंे मुख्यतः एक अजीब सा नजारा सामने आता है। जैसे-जैसे सड़कंे चैड़ी होती जाती हैं, इन पर विभिन्न प्रकार के अतिक्रमण होना प्रारंभ हो जाते हैं। छोटी-छोटी गुमटियां जिनमें पान, बीड़ी, सिगरेट, गुटखा आदि बेचने वालों से लेकर पंचर जोड़ने वाले तक शामिल हंै, रातोंरात स्थापित हो जाती हैं। एक बार चैड़ीकरण की प्रक्रिया से निकलकर चमकदार काली सतह वाली सड़क को देखकर यह अनुमान लगाना कठिन होता है कि सड़क नागरिकों की सुविधाओं को दृष्टिगत रखते हुए चैड़ी की गयी है, अथवा उन्हीं नागरिकों की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के उद्देष्य से लगाई गयी गुमटियों, ठेलों आदि के द्वारा नई नवेली सड़क का आकार संकुचित किया गया है! नागरिकों को भी शायद अपनी इच्छाओं की पूर्ति का ध्यान रखना आवश्यक लगता होगा, तभी तो शायद ही कोई ऐसे असुरक्षित, अनावश्यक एवं गैर-कानूनी अवरोधों के विरूद्ध आवाज उठाता हो........। अब ठेलों को ही ले लीजिए। ठेलों में पहिए लगे होते हैं और वे चलायमान होते हंै। फिर भी नगर की मुख्य सड़कों पर विशेष रूप से, विभिन्न किस्मों के सामान बेचते ठेले किसी एक स्थान पर पूरे समय खड़े हुए नजर आते हंै। अक्सर इन ठेलों पर कुलीनजन इसलिए भी आकर रूक जाते हंै कि शायद इन पर बिकने वाला माल बाजार स्थित पक्की दुकानों से सस्ता होगा! दाम चाहे जो भी हो, पर यह स्वतः स्पष्ट है कि इनके प्रयोग से अच्छी खासी सड़क भी ग्रीष्मकाल में सूखी हुई नदी की तरह नजर आती है और इन पर चलने वाले नागरिक आये दिन दुर्घटनाओं के शिकार होते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं बिना किसी छत अथवा आवरण के कतिपय लोग खुले आसमान के नीचे इन्हीं सड़कों पर अपना व्यवसाय प्रारम्भ कर देते हैं। उदाहरण के लिए, दुपहिया वाहनों को ठीक करने/मरम्मत का कार्य, चालकों के लिए हेल्मेट बेचेने का कार्य, किसी सिनेमाघर अथवा किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान के निमित्त अस्थायी पार्किंग की व्यवस्था आदि। ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि एक आम आदमी की दिनचर्या को साक्षात देखना है तो महानगरों/कस्बों की सड़कों को दर्पण मानकर वास्तविकता से रूबरू हुआ जा सकता है।
    पर क्या इस अतिक्रमण की समस्या का कोई समाधान नहीं है? मात्र कानून बना देने से समस्याएं दूर नहीं हो सकतीं, इनके लिए आम आदमी की सकारात्मक सोच सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यह सच है कि सड़कों पर अवैध रूप से कब्जा जमाए लोग अपनी आजीविका चलाने के लिए ऐसा स्थान ढॅूंढते हंै जहां से उनकी इतनी  आमदनी हो जाए कि घर-परिवार चल सके। अतः आर्थिक समस्या के शिकार ऐसे लोगों के प्रति सहानुभूतिपर्वूक दृष्टिकोण अपनाते हुए क्या इस बात पर विचार नहीं किया जा सकता कि किसी भी बाजार के एक कोने में स्थान निर्धारित कर ऐसे लोगों को स्थान दिया जाए जहां वे अपनी गुमटी रख सकें अथवा ठेला खड़ा कर सकें। इस कार्य हेतु स्थानीय निकायों की रिक्त भूमि का भी सम्यक उपयोग किया जा सकता है। जहां कालोनियां बन रही हंै, वहां पर अभी से स्थान निर्धारित किया जा सकता है। यदि हम इन लोगों के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित नहीं करेंगें तो अतिक्रमण की समस्या का समाधान मात्र कानूनी कार्यवाही अथवा प्रशासनिक बल प्रयोग से नहीं किया जा सकता है जैसा कि हमने पिछले अनेकानेक वर्षों से करके देख लिया है। अतिक्रमण  की समस्या घटने के बजाय और अधिक बढ़ रही है। फलस्वरूप होने वाली दुघर्टनाओं के दृष्टिगत कानून-व्यवस्था की समस्या भी आम हो गयी है। यदि छोटे-छोटे कामगारों तथा व्यवसायियों के लिए स्थान निर्धारित करके व नाना प्रकार के ठेलों को मुख्य मार्गो के स्थान पर कालोनियों व मोहल्लों के भीतर विचरण करने के लिए प्रेरित किया जाय तो शायद इस विकराल समस्या का समाधान करने में हम सफल हो सकेंगे। पर इसके लिए समाज के सभी वर्गों को सोचना प्रारम्भ करना होगा और वह भी सकारात्मक रूप से। विदेशों, खासकर पश्चिमी देशों में काफी हद तक सफलतापूर्वक अतिक्रमण की समस्या से निपटा जा रहा है। हम भी ऐसा कर सकते हैं - पहले ऐसा विष्वास हम सभी को अपने मन-मस्तिक में जगाना होगा।

राकेश चंद्रा
लखनऊ

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