ग्राम टुडे ख़ास

भोजपुरी : विमर्श बदलने की जरूरत

विश्वजीत शेखर राय

एक भाषा के रूप में भोजपुरी वर्तमान में अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की तरह ही अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। भोजपुरी का यह संघर्ष एक भाषा के रूप में स्थापित होने, जनमानस में सर्व सुलभ होने, युवा पीढ़ी को अपने गौरवशाली साहित्यिक विरासत से जोड़ने, नए पाठकों तक पहुँचने एवं देश में एक संवैधानिक भाषा के रूप में स्थापित होने का है। एक भाषा के रूप में भोजपुरी के समक्ष शैक्षिक पाठ्यक्रमों की कमी एवं रोजगार के पर्याप्त अवसरों की अनुपलब्धता भी एक गंभीर समस्या है।

किसी भाषा की सफलता एवं उसके समक्ष उपस्थित चुनौतियों को विस्तार से समझने के लिए उसके आर्थिक पहलू के साथ-साथ भाषा के पाठक एवं भाषा-भाषी वर्ग के सामाजिक स्तर, भाषा हेतु चल रही वर्तमान साहित्यिक गतिविधियों, भाषा के ध्वजवाहक रचनाकारों की विचारधारा एवं उनके लोकप्रियता के स्तर को भी समझना जरूरी है। इन्हीं बिंदुओं पर यदि भोजपुरी भाषा की विवेचना करें तो पाएंगे कि आर्थिक आधार पर भोजपुरी कि स्थिति हिन्दी पट्टी की अन्य बोलियों की तरह ही है, यह मैथिल जैसी संवैधानिक प्रश्रय पा रही भाषाओं से पीछे है एवं उपभोगतावाद के बाजार में हिन्दी के मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र के सामने दिन हीन अवस्था में है।

भोजपुरी भाषा को समझने एवं बोलने वाले लोगों की संख्या 15 करोड़ से अधिक है, इतनी बड़ी संख्या के बावजूद भोजपुरी के लिए बाजार के अभाव का मुख्य कारण आज़ादी के आंदोलन के समय उत्पन्न हुआ हिन्दी राष्ट्रवाद है। हिन्दी राष्ट्रवाद के कारण लोगों ने आंचलिक भाषाओं को छोड़ कर राष्ट्र को मजबूत करने के लिए हिन्दी की व्यापकता को स्वीकार किया। जब कभी हिन्दी को सामने से किसी भाषा ने चुनौती देने का प्रयास किया तो उसे राष्ट्र विरोधी माना गया। इसके उदाहरण भारत के हिन्दी पट्टी में व्यापक रूप से देखे जा सकते हैं जहाँ स्थानीय भाषाओं के पर काट कर हिन्दी को मज़बूती दी गयी। आप ने देखा होगा कि कैसे हिन्दी बनाम तमिल को अलगाववाद की घटना के रूप में देखा जाता है। एक भाषा को राष्ट्रवाद से जोड़ने पर अन्य भाषाएँ लाजमी रूप से कमजोर होती हैं, यह भारत की हिन्दी पट्टी से साथ-साथ पाकिस्तान में भी देखा जा सकता है कि कैसे वहाँ की स्थानीय भाषाएँ सिंधी, पंजाबी, बलूचिस्तानी आदि संघर्ष कर रही हैं और उत्तर भारत से गयी उर्दू वहाँ सत्ता का प्रश्रय पा कर अपने पंख फैला रही है। इसी भाषाई राष्ट्रवाद के कारण सिनेमा, मीडिया एवं विज्ञापन जैसे उद्यमों में हिन्दी ही भोजपुरी-भाषी वर्ग का भी प्रतिनिधित्व करती है। इस प्रकार हिन्दी बाजार में स्थापित है और भोजपुरी का अर्थतन्त्र बेहद कमजोर है।

अन्य पहलुओं कि चर्चा करें तो भोजपुरी का पाठक वर्ग एक सीमित संख्या में है, भोजपुरी के पास एक समृद्ध साहित्य है लेकिन इसे नए पाठकों, खासकर युवा पाठकों में और जगह बनाने कि जरूरत है। भोजपुरी के भाषा-भाषी वर्ग के सामाजिक स्तर की बात करें उससे पहले यह समझना अनिवार्य है कि भोजपुरी के भाषा-भाषी व्यापक स्तर पर फैले हुए हैं, भौगौलिक एवं सामाजिक दोनों आधार पर व्यापक विस्तार है। लेकिन यहाँ यह भी नहीं भूलना चाहिए कि एक बड़े भोजपुरी भाषी वर्ग में हीनताबोध व्याप्त है, जो अपने आप को इस भाषा से अलग करने के प्रयास में रहता है और सार्वजानिक रूप से बोलने में परहेज करता है। भोजपुरी को आगे बढ़ने के लिए परिवार के इन रूठे लोगों को ना सिर्फ अपने साथ जोड़ना होगा अपितु हीनताबोध की भावना के स्थान पर भोजपुरी को गर्व के साथ आत्मसात करने की हिम्मत भी देनी पड़ेगी।

भाषा हेतु चल रही वर्तमान साहित्यिक गतिविधियों की दृष्टि से भोजपुरी बीते दो-तीन दशकों की तुलना में बेहतर स्थिति में है। कला, लेखनी, विमर्श हर मोर्चे पर बेहतर कार्य एवं आयोजन हो रहे है, इसके लिए वे लोग विशेष प्रशंसा के पात्र है जो लोग इन गुजरे दशकों में, प्रतिकूल परिस्थितियों में भाषा एवं साहित्य के लिए संघर्ष करते रहे है। अगर भाषा के ध्वजवाहक रचनाकारों की विचारधारा की बात करें तो यह बात प्रमुखता से उभर कर आती है कि भोजपुरी के रचनाकार हिन्दी में भी लिखते-पढ़ते रहे। अतः वे भोजपुरी के लिए हिन्दी से आरपार की लड़ाई के लिए कभी तैयार नहीं हो पाए। जिससे भाषा का स्तर हमेशा हिन्दी से कमतर एवं हिन्दी की बोली के रूप में आँका जाता रहा। ध्वजवाहक रचनाकारों को भोजपुरी को उचित सम्मान दिलाने के लिए हिन्दी मोह से बाहर निकलना पड़ेगा और यह भी समझना जरूरी है कि भोजपुरी, हिन्दी के खिलाफ नहीं है और हिन्दी को भोजपुरी से कोई खतरा नहीं है। भोजपुरी की स्वीकार्यता ही भोजपुरी के रचनाकारों की पहचान को बड़ा करेगी। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि यदि रचनाकार सिर्फ भोजपुरी का है तो वह जनपद स्तर का साहित्यकार बनकर रह जाता है। भोजपुरी को अपने कलमकारों की लोकप्रियता को भी बढ़ाना पड़ेगा।

भोजपुरी विमर्श पर दशकों पुरानी आवाजें जो बृहद जनमानस तक पहुँच नहीं पा रही थीं आज टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया के माध्यम से पहुँच रही हैं। लेकिन भोजपुरी विमर्श का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ अश्लीलता पर केंद्रित हो जाता है, हमें समझना चाहिए कि भाषा में व्याप्त अश्लीलता एक सार्वभौमिक समस्या है एवं भोजपुरी को आगे बढ़ने एवं समृद्ध होने के लिए विमर्श को बदलने की जरूरत है जिससे आवश्यक एवं मूल विषयों पर चर्चा से इस भाषा में रचनात्मक एवं सकारात्मक परिवर्तन संभव हो सके।
विश्वजीत शेखर राय,
स्वतंत्र टिप्पणीकार

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