ग्राम टुडे ख़ास

दो बीघा ज़मीन तब और अब….

डॉ. रमाकांत क्षितिज

अभी अभी एक फ़िल्म देख रहा था। फ़िल्म आज़ादी के आसपास की थी। फ़िल्म का नायक जो की किसान है। कहीं से भी नायक हीरो नही लगता। पूरी फ़िल्म में परिस्थितियां ही नायक लगती है।

किसान के लिए ज़मीन का महत्व ,उसकी ईमानदारी उसके वसूल ,उसकी भूख से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। फ़िल्म लगभग सत्तर साल पुरानी होकर भी, आज भी प्रसंगिक लगती है।

उस समय ज़मीदार के ब्याज से परेशान किसान,शहर में रिक्शा खींचता है, अर्थात जो हालात गांवों में छोटे किसानों का है। वही हाल शहरों में मजदूरों का है।

शहर के किसान मज़दूर हैं। ज़मीदार कौन है ! आप भी समझ ही सकते हैं। ग़रीब किसान का बेटा बहुत ही ईमानदार है। विषम परिस्थितियों में भी चोरी को चोरी ही कहता है। अपने लिए कोई नया तर्क नही गढ़ता।

किसान अनपढ़ है। किसान का बेटा लिखना पढ़ना जानता है। पचास के दशक में यह उम्मीद की किरण थी। आज सत्तर साल बाद भी वह बेटा इतना नही लिख पढ़ पाया की अपने ग़रीब पिता की गरीबी हटा सका हो। हा कुछ लोग ज़रूर कर पाएं है। पर अभी बहुत नही कर पाए।
फ़िल्म के अंत मे किसान की ज़मीन चली जाती है।

वह उसके बिना भी जीने की कोशिश करता है। पचास के दशक में वह टूटता नही। वहीं इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में आज का किसान टूटता है,विखरता है।

यहाँ तक की आत्महत्या भी करता है,हजारों की संख्या में।फ़िल्म में एक सीन में, किसान का बूढ़ा पिता ,अपनी ज़मीन खो देने के बाद, पागल हो जाता है।

उसी पागलपन में कहता है — पहले दो बीघा जमीन थी वह भी चली गयी…अब कुछ नही बचा… जिसके पास कुछ न हो वह कहीं भी जा सकता है।

जिसका कोई मूल ही न हो। कोई आधार ही न हो वह कहीं भी जा सकता है। उसका सबकुछ है …किसी से भी ले सकता है..भीख मांग सकता है।

किसी ज़माने में घर के बर्तन भी सम्पति हुआ करते थे। सभी के पास बर्तन भी न हुआ करते थे। शहरी गरीब बच्चे पचास के दशक में भी बूट पॉलिश करते थे।

आज भी चाय की टपरी से लेकर पॉलिस तक कर ही रहे हैं।ग्रामीण जीवन और शहरी जीवन किसान, मज़दूर के लिए एक जैसे ही हैं। जी हां मैं विमल रॉय की फ़िल्म दो बीघा ज़मीन की बात कर रहा हूं।

किसान की भूमिका में बलराज साहनी साहेब थे। पूरी फिल्म में कहीं बलराज साहनी दिखे ही नही। सिर्फ महतो किसान ही दिखा। निरूपा रॉय,नाना पलसीकर,नसीर हुसैन,मास्टर जगदीप सब ने एक से बढ़कर एक अदाकारी की है। ग्रामीण जीवन और उस वक्त के कलकत्ते का जीवन आप इस फ़िल्म में देख सकते हैं।

जिस तरह कोरोना से इस समय आर्थिक मंदी आ गयी है। इस फ़िल्म में भी माध्यम वर्ग की आर्थिक मंदी को दर्शाया गया है। दो छोटी बच्चियां जिन्हें फ़िल्म का नायक किसान जो कलकत्ते में रिक्सा चलाता है। उन बच्चियों के पिता आमदनी कम होने के कारण बच्चियों का रिक्सा स्कूल जाने के बंद कर देते है। बच्चियां स्कूल पैदल जाने लगती हैं।

किसान के लिए बरसात का महत्व उसकी खुशी,उसके खेत तो उसकी आत्मा ही हैं। दस बारह साल के बच्चें की मां का उसके पति प्रति समर्पण, और चिट्ठी में उसे क्या सम्बोधित करे..उसकी झिझक का दृश्य फ़िल्म में निरूपा रॉय का अभिनय देखते ही बनता है।

बलराज साहनी जी तो इस फ़िल्म की आत्मा ही हैं। ग़रीब किसान उसकी पीड़ा उसका आत्मसम्मान ,एक एक आने के लिए उसकी बेबसी, उसकी टूटन,उसका फिर फिर उठना,उसकी बेटे के प्रति प्रेम,पत्नी के प्रति बेबसी, कुछ न दें पाने की कसक, बॉडी लेंग्वेज से लेकर टूटती बिखरती, कभी दृढ़ तो कभी कांपती आवाज़ सब कुछ,किसान की पीड़ा को दर्शा देते है।

विमल रॉय जी के बारे में इतना ही कहना है। काश ! हमारे दौर में भी विमल रॉय होते। दो बीघा ज़मीन …अब दो सौ स्क्वायर फुट के रूम ने ले ली है, शहरों में। गांवों में ….
( कुछ समय पहले लिखा लेख )
डॉ. रमाकांत क्षितिज
संकलन विनोद कुमार सीताराम दुबे संस्थापक सीताराम ग्रामीण साहित्य परिषद एवं इंद्रजीत पुस्तकालय जुडपुर रामनगर विधमौवा मड़ियाहूं जौनपुर उत्तर प्रदेश

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