ग्राम टुडे ख़ास

दुनिया में धर्म

जयश्री बिर्मी

आज के युग में धर्म और जाति की संज्ञा क्या हैं? अपने मतलब के लिए ,अपने ही हिसाब से मोड़ तोड़ के उपयोग में लेना।अपनी आर्थिक,सामाजिक,नैतिक परिस्थितियों के लाभ के लिए धर्म या जाति का उपयोग करना कहा तक योग्य हैं? भारत में रेह के भारत के प्रति निष्ठा रखना वह भी राष्ट्र धर्म ही हैं किंतु अपने स्वार्थी ,मतलबी हेतु के अंतर्गत उसका क्षय दिन ब दिन बढ़ता जा रहा हैं।कोई भी अनर्गल बात कर अपना नाम करने को तत्पर हैं,बदनाम हुए तो क्या हुआ,नाम तो हुआ यही नजरिया हैं सभी का,चाहे राजकरण हो,व्यापार जगत हो या आम समाज हो,सब अपनी खिसियाहट निकलने के लिए धर्म और जा
ति का प्रयोग कर अपने घ्येय को पाने को तत्पर हैं।
किसी को देश का लोक तंत्र खतरे में लगता हैं कोई खुद को देश में सुरक्षित नहीं पता हैं।जो असुरक्षित है उन्ही को इसी देश और देश वासियों ने नाम ,शौहरत और धन दिया हैं।खास कर राजनैतिक दलों में तो विधर्मी ही नहीं अपने ही धर्म वाले अपने ही धर्म के बारे में अनर्गल बातें कर अपनी राजनैतिक रोटियां सकते हैं।
बहुत पहले एक लेख पढ़ा था।पुराने जमाने की बात है, मुसफरों से भरा हुआ रेल का डिब्बा था,सब कोई न कोई विषय पर चर्चा कर रहे थे।कोई खाने पीने के बारे में,कोई महंगाई के बारे में तो कोई राजनीति के बारे में।
एक कोने में खिड़की के पास बैठे एक सज्जन जो ईसाई से लग रहे थे, अपने साथ बैठे सज्जन से पूछ रहे थे कि अपने देश में कितने धर्म है? तो वो सज्जन बोले कि वे तो हिंदू हैं और रोज पूजा अर्चना करते हैं और ऐसा करने से उनको मानसिक शांति मिलती हैं।तो वह बोला जनाब शांति से ज्यादा तो लाभ होना जरूरी है,भौतिक लाभ।जैसे वह भी पहले हिंदू था खूब मंदिरों में गया दान धर्म में काफी कुछ पाया किंतु बाद में पता लगा की इस्लाम कुबूल करने में ज्यादा फायदा हैं तो उसने इसलाम कुबूल कर लिया तो मुफ्त में राशन और कपड़े उपलब्ध हुआ करते थे। अब हुआ कि इस्लाम का बहुत फायदा उठा लिया कोई ओर धर्म के बारे में सोचा जाए,और किसी ने बताया कि गुरुद्वारे में खाना आदि मुफ्त में हो जाता है और जनाब ने केश रख पाग पहली और गुरुद्वारे से मिलती सभी सहाय का भरपूर फायदा उठाया और अपने परिवार को सुखी कर आनंद से रहने लगा। कुछ साल ऐसा ही चला अब बच्चे बड़े हो रहे थे और पढ़ाई आदि के खर्च बढ़ रहे थे तो वह ईसाई फादर से मिला और ईसाई बन गया। अब बच्चो की फीस आदि का खर्च बंद हो गया और सपरिवार सुखी था।
अब वो सज्जन से पूछ बैठा की क्या इनके अलावा भी और धर्म है अपने देश में जिसे वह अपना कर परिवार का कल्याण कर सके?
कुछ ऐसी ही परिस्थितियां हैं हमारे देश की,कोई विधर्मी तो ठीक कोई खुद ही अपने धर्म को लांछन लगा के अपने देश और धर्म को कमतर साबित करने में लगे हैं,विशाल भारत वर्ष इतिहास में हुई ऐसी ही गलतियों से सिमट कर रह गया हैं।अब भी ऐसे जयचंदो पर कुछ कार्यवाही नहीं हुई तो हम सभी इसके लिए जिम्मेवार होंगे।
सरकार को भी कुछ सख्त कानून बनाने पड़ेंगे,क्योंकि नामी गरमी लोगो के वक्तव्यों का असर कुछ ज्यादा ही होता हैं जनता पर।इसी देश से कमाया सब धन देश के लिए जरूरत के समय न दे सके तो उनकी सोच,नियत और इरादों के बारे में संशय होना एकदम ही वाजिब है।

जयश्री बिर्मी
अहमदाबाद

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