ग्राम टुडे ख़ास

ई-कचरे का संकट

राजेश चंद्रा
वर्तमान समय में हमारे देश में इलेक्ट्रानिक उपकरणों की बाढ़ सी आ गयी है। अनगिनत प्रकार के देशी-विदेशी उपकरण हमारे घरों, कार्यालयों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों आदि में आसानी से देख जा सकते हैं। बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी इलेक्ट्रानिक उपकरणों का प्रयोग बहुतायत से कर रहे हैं। बाजार में भी खूब प्रतिस्पर्धा हैं। नित नये-नये उपकरण विभिन्न माडलों में उपभोक्ताओं को लुभाने के लिये व्यापारिक प्रतिष्ठानों में उपलब्ध हैं। कम्प्यूटर, लैपटाप, नोटबुक, आई पैड, मोबाइल फोन, टी.वी. आदि कितनी ही दैनिक उपयोग की वस्तुएँ अब इलेक्ट्रानिक अवतार में आमजन द्वारा प्रयोग में लाई जा रही हंै।
प्रतिस्पर्धा के इस दौर में बाजार में एक ही इलेक्ट्रानिक उपकरण के नये-नये माॅडल आये दिन उपलब्ध हो रहे हैं। ऐसी दशा में उपभोक्ता भी पुराने माॅडल को छोड़कर नये की तरफ भागता हैं। सेल फोन, लैपटाॅप, कैमरे आदि इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हंै। इतना ही नहीं, अधिकांश इलेक्ट्रानिक उपकरणों के खराब हो जाने पर उनकी मरम्मत या तो संभव नहीं हो पाती है या फिर उसकी कीमत काफी अधिक होती है। दोनों ही दशाओं में उपभोक्ता के लिये नया उपकरण लेना आवश्यक हो जाता है। इस प्रकार घरों में पुराने और खराब इलेक्ट्रानिक उपकरण धीरे-धीरे जमा होने लगते हैं जिन्हें या तो कूड़े में फेंक दिया जाता है या फिर कबाड़ में बेच दिया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की दिसम्बर, 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार सम्पूर्ण विश्व में वर्ष 2016 में कुल 44.7 मिलियन टन इलेक्ट्रानिक कचरे की प्राप्ति हुई जिसका कुल वज़न फ्राँस की 4,500 आइफेल टावरों के भार के समकक्ष माना जा सकता है। भारत का इस ई-कचरे में योगदान 2 मिलियन टन का था। इस बड़ी मात्रा में उत्पन्न ई-कचरे के मात्र 15.5 प्रतिशत का निस्तारण किसी राष्ट्रीय स्तर पर योजित कार्यक्रम के अन्तर्गत किया गया। भारत में भी 88 प्रतिशत के करीब ई-कचरे, जिसमें सेलफोन, कैंमरे, एयर कंडीशनर, टी.वी., और एल.ई.डी. लैम्प शामिल हैं, का निस्तारण पारस्परिक रूप से उन्हें हाथ से तोड़कर किया गया। उल्लेखनीय है कि ऐसा करना मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण की दृष्टि से अत्यन्त हानिकारक है।
यहाँ यह संज्ञान में लेना आवश्यक है कि पूरी दुनिया में अभी भी अधिकांश ई-कचरे का निस्तारण पारंपरिक तरीके से हाथ से तोड़कर या ‘मैनुअली’ किया जाता है जो किसी भी दशा में उचित नहीं है। इन उपकरणों में विभिन्न प्रकार के हानिकारक पदार्थ यथा ऐसिड, गैंसें, खतरनाक रैडियेशन आदि संग्रहीत होते हैं जो मनुष्य के स्वास्थ्य के लिये अत्यन्त हानिकारक हैं। इनसे पर्यावरण को भी क्षति पहुंचती है। वैज्ञानिकों द्वारा इन पदार्थों के निस्तारण हेतु विभिन्न वैज्ञानिक विधियाँ विकसित की गई हैं। सरकारों द्वारा ऐसी अनेक संस्थाओं को ई-कचरे के वैज्ञानिक विधियों से निस्तारित करने हेतु अधिकृत किया गया है। पर कूडे या कबाड़ के ढेर में फेंके जाने पर ऐसी सामग्री अधनिकृत लोगों तक पहुँच जाती है जो अपने स्तर पर अपने तरीके से इसका जोखिमपूर्ण निस्तारण करते हैं। अपने देशके कुछ हिस्सों में यह कुटीर उद्योग की तरह पनप चुका है। वर्तमान में भारत में ई-वेस्ट मैनेजमेन्ट रूल्स, 2016 प्रख्यापित हैं जिसके अनुसार 30 प्रतिशत ई-कचरे का निस्तारण निर्माता कम्पनियों द्वारा किया जाना हैं।
अतः पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य की रक्षा करने के उद्देश्य को दृष्टिगत रखते हुए यह आवश्यक है कि हम अपने घरों अथवा दुकानों और कार्यालयों में एकत्रित ई-कचरे को अधिकृत संस्थाओं अथवा डीलरों को ही प्रदान करें। लगभग प्रत्येक मध्यम और बड़े शहरों में इस प्रकार की संस्थाओं एवं डीलरों को सरकार द्वारा अधिकृत किया गया है। कूड़े में फेंकने अथवा कबाडि़यों को बेचने से हम न केवल अनधिकृत एवं गैरकानूनी कार्य को बढावा देते हैं वरन मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण को भी क्षति पहुंचाने में अपना अवंाछित योगदान प्रदान करते हैं। यह समस्या दिन पर दिन विकराल होती जा रही है। बिना जनसहयोग के समस्या का समाधान कदाचित सम्भव नहीं है।
राजेश चंद्रा
लखनऊ

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