ग्राम टुडे ख़ास

फुटपाथ की संस्कृति

राकेश चंद्रा
शहरों में पैदल चलना मानो जीवन के साथ तादात्म्य बिठाने जैसा है। जब आप पैदल चलते हैं तो आप शहर को जीते हैं, उसे अनुभूत करते हैं। जब आप पैदल चलते हैं तो आप शहर को ‘फ्रेंडली आर्गेनिज्म’ के रूप में देखते है। शहरों में पैदल चलना एक अच्छा अवसर प्रदान करता है कि आप उन तमाम लोगों की जीवनशैली से रूबरू हो सकें जो सड़कों के किनारे झोपड़ीनुमा दुकानों या लकड़ी के खोखो में सामान बेचकर अपना जीवनयापन करते हैं। मुम्बई जैसे महानगरों में पैदल चलने के लिए निर्मित फुटपाथों पर लोग अपनी पूरी जिंदगी बसर कर देते हैं। शायद इसीलिए विद्वान नगरीय समाजशास्त्री पीटर गिडेस ने कहीं लिखा है कि शहरी नियोजन की शुरूआत पैदल चलने से ही होनी चाहिए। पैदल चलकर ही आप शहर की नब्ज पहचान सकते हैं। खास-खास स्थानों से सर्वे कर नियोजन की परिकल्पना अमूर्त की श्रेणी में आयेगी जिसमें रेखागणित तो होगी पर जीवन नहीं होगा। क्या आज की पीढ़ी इस बात की कल्पना भी कर सकती है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन में पद यात्राओं की कितना बड़ा योगदान था। सत्याग्रह और दांडी मार्च ने पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को हिला कर रख दिया था। अनादि काल से हमारे पूर्वजों ने पैदल यात्रा को अपनी जीवन शैली का अंग बनाया था। आज भी सेवानिवृत्त एवं वृद्धजनों के लिए सुबह-शाम अपने मित्रों एवं सहयात्रियों के साथ पैदल टहलना एक टॅानिक के समान है जो कितने अवसादों को दूर भगाने में सहायक हैं। मध्यम आयुवर्गों के लिए स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से प्रातःकाल पैदल टहलना कितना लाभप्रद एवं उपयोगी है। इसकी व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है। कुल मिलाकर पैदल चलना न केवल बेहतर स्वास्थ्य की दृष्टि से बल्कि निरंतर सामाजिक परिवेश के साथ तालमेल बैठाने के उद्देश्य से भी मनुष्यों के लिए एक सतत आवश्यकता है।
पर शहरों से बढ़ती आबादी, दिन प्रतिदिन विषय बनती जा रही यातायात की समस्या, निरंतर बढ़ते वाहनों की समस्या और हर व्यक्ति को दूसरे से आगे निकलने की जल्दी ने पैदल चलने वालों के लिए एक गंभीर समस्या खड़ी कर दी है। उपरोक्त कारणों से सड़कें तो पर्याप्त मात्रा में चैडी की गईं तथा उनकी स्थिति में भी उत्तरोत्तर सुधार हुआ है। पर इन सड़कों पर पैदल चलने के लिए फुटपाथों के बीच में वृक्षारोपण किया गया है जिसके कारण भी उन पर पैदल चलना कठिन हो गया है। पुटपाथों का प्रभावी उपयोग सड़क के किनारे स्थित दुकानदारों द्वारा किया गया है जिनके लिए फुटपाथ मात्र उनकी दुकान का एक्सटेंशन है। इसके अतिरिक्त फुटपाथों का भरपूर उपयोग छोटी-छोटी आजीविका चलाने वाले फड, खोंमचा आदि लगाने वालों द्वारा किया जा रहा है। फिर प्रश्न यह उठता है कि पैदल चलने वालों के पास विकल्प क्या है? शहरों में छोटे-मोटे उद्यान एवं पार्क तो कई हैं पर सब में टहलने की उचित व्यवस्था नहीं है। अधिकांश व्यक्ति सड़क के किनारे टहलने को प्राथमिकता देते हैं। पर बिना फुटपाथ या पैदल चलने के लिए उचित स्थान की व्यवस्था के सड़क पर पैदल चलना मानो साक्षात यमराज को न्यौता देने जेसा है। कब कोई छोटा-बड़ा वाहन आपका टिकट कटा दे, कोई नही जानता! तो क्या निवास स्थल की परिणति कारागृह में होने से पूर्व ही हमें मिलकर इस कठिन समस्या का समाधान खोजना प्रारंभ नहीं कर देना चाहिए? चलते रहना ही जीवन है। भारतीय दर्शन में कहा गया है ‘चरैवेति, चरैवेति’।

राकेश चंद्रा
लखनऊ

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