ग्राम टुडे ख़ास

घर से कारोबार

राकेश चंद्रा

गांवों में निरंतर बढ़ता पलायन एवं शहरों का तेजी से विकास, बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध की पहचान बन चुकी है। इक्कीसवीं शताब्दी में तो मानों इस प्रवृत्ति को पंख लग गये हैं। शहरों की चकाचैंध ग्रामीण जनता को किस प्रकार आकर्षित कर रही है, इसका अनुमान कुछ समय पूर्व प्रकाषित एक शोधपत्र से लगाया जा सकता है कि भारत की आधी आबादी वर्ष 2050 तक शहरों में रह रही होगी।
पिछले कुछ वर्षों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब आदि के गाॅंवों का विकास शहरों की भांति हुआ है। पक्के मकान, पक्के संपर्क मार्ग एवं नालियां, टीवी, फ्रिज, मोबाइल आदि की सुविधाओं ने गांवों की दशा बहुत बदल दी है। पर इन स्थानों में भी शहरों में पलायन की प्रवृत्ति थम गयी हो, ऐसा नही कहा जा सकता है। रोजगार के बेहतर अवसर निःसंदेह शहरों में हैं और एक बेहतर जीवनशैली का पर्याय भी ये शहर बन चुके हैं। देश में महानगरों के बाद अब छोटे व मध्यम कस्बों का भी शहरीकरण तेजी से हो रहा है। इस विकास की एक मुखर अभिव्यक्ति बनती जा रही है- तेजी से विकसित होने वाली वैध-अवैध आवासीय कालोनियां, जिनमें एक नई किस्म की शहरी सभ्यता का प्रादुर्भाव हो रहा है। इन आवासीय परिसरों में हजारों की संख्या में लोग आवासित होते है और अक्सर ये परिसर शहर से दूर बसाये जाते हैं। अतः नित्यप्रति की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऐसी कालोनियों में वाणिज्यिक, व्यापारिक केंद्र की भी आवश्यकता होती है। पर ऐसा बहुत कम आवासीय परिसरों में देखने को मिलता है। परिणामस्वरूप, आवासित लोगों में से कतिपय लोग अपने-अपने आवास के एक कक्ष में दुकानें खोल लेते हैं।  धीरे-धीरे इन दुकानों की संख्या बढ़ने लगती है और दुकानों में विविधता भी परिलक्षित होती है। यही हाल उन आवासीय परिसरों का भी है जो शहर के मुख्य मार्गों के किनारे अवस्थित है। प्रायः यह देखा जाता है कि इन परिसरों के आवास का एक कक्ष दुकान अथवा वाणिज्यिक प्रतिष्ठान में तब्दील हो जाता है और तदुपरांत शनैः शनैः अन्य आवासों में भी यही सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। वैसे तो उक्त परिसर के निवासियों की सुख-सुविधा की दृष्टि से यह व्यवस्था लाभकारी होती है, पर कालांतर में इस व्यवस्था से कुछ कष्ट भी होने स्वाभाविक है। दुकानों से खरीदारी करने के लिए वाहनों का प्रयोग, वाहनों में लगे विभिन्न प्रकार के प्रेशर हार्न, साइरन आदि और उनसे निकलने वाली विचलित करने वाली ध्वनियांॅ तथा अनवरत् बिजली की आपूर्ति के लिए जेनरेटरों का प्रयोग, जिनसे उत्पन्न होने वाले ध्वनि एवं वायु प्रदूषण कुछ ऐसे महत्वपूर्ण बिंदु हैं जिनसे वहां के नागरिकों को आये दिन दो-चार होना पड़ता है।
यह एक तथ्य है कि ऐसी प्रत्येक आवासीय कालोनी में पढ़ने वाले बच्चे भी रहते हैं और सेवानिवृत्त एवं वरिष्ठ नागरिक भी रहते हैं जिन्हें  जीवन की अन्य मूलभूत आवश्यकताओं के अतिरिक्त शांत वातावरण की आवश्यकता सबसे अधिक अनुभव होती है। ध्वनि एवं वायु प्रदूषण के अतिरिक्त वाहनों का जाम और गाडि़यो को खड़ी करने को लेकर अनावश्यक विवाद जैसी समस्याएं अक्सर कानून-व्यवस्था की समस्या बन जाती है। वास्तव में, किसी भी व्यक्ति द्वारा दुकान अथवा व्यापारिक प्रतिष्ठान खोलते समय यह नहीं देख जाता है कि दुकान के आगे पार्किंग की कोई व्यवस्था है भी या नहीं? यह सोचने का समय अब आ गया है। आवासीय एवं वाणिज्यिक गतिविधियों में संतुलन बनाये रखने में ही सबकी भलाई है। दिन भर की थका देने वाली भाग-दौड़ व कठिन परिश्रम के पश्चात  यदि व्यक्ति को अपने आवास में या आवासीय परिसर में भी मानसिक शांति न मिल सके तो ऐसे व्यक्ति या व्यक्ति समूह को अभागा ही कहा जाएगा।
आवासीय परिसरों में चाहे वो शहर से दूर हो या बीच शहर में, वाणिज्यिक गतिविधियों का प्रसार एक सीमा तक होना भी प्रत्येक दशा में अभीष्ट एवं लाभप्रद है वरना किसी शायर द्वारा कही गयी इन पंक्तियों को हम शायद कभी भुला न पायेंगे कि ‘हम है मता-ए-कूचा ओ बाजार की तरह, उठती है हर निगाह खरीदार की तरह’’।

राकेश चंद्रा
लखनऊ

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