ग्राम टुडे ख़ास

“गुरु पूर्णिमा पर विशेष”

भावना ठाकर
हमारे जीवन को नई राह दिखा कर हमें हर विषय के ज्ञान से परिपूर्ण करने वाले समस्त गुरुजनों को गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर कोटि-कोटि नमन। गुरु के महत्व को हमारे सभी संतो, ऋषियों एवं महान विभूतियों ने उच्च स्थान दिया है। गुरु हमें अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं,तभी तो संत कबीर ने लिखा है।
“गुरु गोविंद दोनों खड़े का कु लागु पाय
बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दियो बताय”

जो गुरु साक्षात हरि दर्शन करवा दे उसका ऋण कैसे उतारा जाए, बिना गुरू के सत्य एवं असत्य का ज्ञान नहीं होता। उचित और अनुचित के भेद का ज्ञान नहीं होता तो गुरू की शरण में जाओ गुरू ही सच्ची राह दिखाएंगे। तभी तो गुरु पूर्णिमा को हम अपना कर्तव्य निभाते गुरुओं के प्रति सौहार्द भाव से नतमस्तक होते है।
पुराने समय में एक ऐसा शिष्य हुआ जिसने अपने हुनर और गुरु भक्ति से अपना नाम इतिहास में दर्ज करवा लिया। वो वीर योद्धा था एकलव्य जिसने गुरु दक्षिणा में अपना अंगूठा काट कर गुरु द्रोण को अर्पण कर दिया था।
गुरु पूर्णिमा का पर्व अषाढ़ के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है इस दिन गुरु और शिक्षक को सम्मानित करते श्रद्धा से उनके प्रति हम अपना ऋण अदा करते है। गुरु के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं होता जन्म हमें माता-पिता देते है पर ज़िंदगी के पाठ हमें गुरु ही सिखाते है। गुरुर्देवो भव: गुरु भगवान समान होते है
“यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देने तथा गुरु”

मतलब जैसी भावना और भक्ति देव यानी भगवान के प्रति है वैसी गुरु के लिये भी होनी चाहिए।
गुरु की महत्ता भगवान से कम नहीं
गुरु ब्रह्मा स्वरुप है क्यूँकी गुरु शिष्य को तराशते है बनाते है। विष्णु स्वरुप गुरु शिष्य की हर तरह से रक्षा करते है हर दोराहे पर सही मार्गदर्शन करते कदम-कदम पर साथ देते है। गुरु को महेश भी कहा गया है शिव की तरह शिष्यों के गुण को सँवार कर दोषों का नाश करके एक सुसंस्कारित व्यक्तित्व को उभारते है।
अषाढ़ के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन महाभारत जैसे महान ग्रंथ के रचयिता महर्षि वेद व्यास के जन्मदिन के रुप में भी मनाया जाता है। वेद व्यास जी ने चारों ग्रंथों की रचना की थी इसलिए हम उन्हें समग्र मानव जाति के गुरु के रुप में भी पूजते है।
सही और सच्चे गुरु के नक्शे कदम पर चलकर इंसान ज़िंदगी की हर विपदा से लड़कर उभर सकता है। गुरु की भूमिका हमारे जीवन में अध्यात्म और धार्मिकता तक सिमित नहीं है अब तो हर क्षेत्र में किसी भी विपरीत परिस्थिति में उचित सलाह देकर देश को भी उभरने में सहायक होते है। आदी अनादिकाल से गुरु शिष्य के संबध भाव पूर्ण और सम्मानीय रहे है तभी आज इक्कीसवीं सदी में भी हम बड़े गर्व से और भाव से ये दिवस मनाते है।
खास कर आज की पीढ़ी को एक सक्षम गुरु की खास जरूरत है, भौतिकवाद में जी रहे बच्चों को सही मार्गदर्शन जरूरी है इस भागदौड़ भरी स्पर्धात्मक ज़िंदगी से उलझते युवाओं को मानसिक स्तर पर मजबूत बनाने के लिए ऐसे गुरु की जरूरत है जो हर चुनौतियों का सामना करने में बच्चों को सक्षम बना सकें। व्याख्यानों और भाषणों द्वारा मानसिक तनाव से बचने के उपाय बताएँ और योग और साधना द्वारा नकारात्मकता के उपर कैसे नियंत्रण पा सके उसका सही ज्ञान दें। आज के दौर में बच्चें छोटी-छोटी बातों पर उग्र होते अनहोनी कर बैठते है ऐसे में एक सच्चा गुरु ही इन सारी चीज़ों से उभरने में सहायक होते है।
आज के दिन अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है, जिन्होंने हमें जीवन के परम लक्ष्य को पाने में अपना श्रेष्ठ योगदान दिया है उन समस्त गुरुजनों के चरणों में प्रणाम तथा शुभकामनाएँ।।
(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

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