ग्राम टुडे ख़ास

जरूरत में हिस्सेदारी

राकेश चन्द्रा

किसी अर्थशास्त्री के नजरिये से देखें तो भारत में वर्तमान समय में उदारीकरण का दौर चल रहा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में आये परिवर्तनों का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है। आय के स्रोतों में वृद्धि हुई है और लोगों की जेबों में पैसा बोलने लगा है। आंकड़ों को देखें तो प्रतिवर्ष भारत में करोड़पतियों एवं अरबपतियों की संख्या में विस्मयकारी वृद्धि हो रही है। आर्थिक प्रगति छन-छन का मध्यम वर्ग तक भी पहुंच रही है। फिर भी समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं यथा रोटी, कपड़ा और मकान के चक्रव्यूह से निरतंर लड़ रहा है। 
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एवं नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर अमत्र्य सेन कहते है कि जब तक समाज के ऊपरी तबके के लोग, जिनके पास निरंतर धनागमन हो रहा है, अपने अर्जित धन का कुछ अंश स्वास्थ्य, शिक्षा आदि जैसे सामाजिक क्षेत्रों में नही लगाएगें, समाज वह निचला तबका जिसे ‘हैव नाट’ कहा जाता है, शायद कभी ऊपर नहीं आ पाएगा। इस प्रकार देश की आर्थिक प्रगति समतामूलक न होकर विभिन्न विसंगतियों से परिपूर्ण होगी। आज की स्थिति में विशालकाय अपार्टमेंटस के निकट झोपड़-पट्टियों की उपस्थिति भविष्य के लिए एक संकेत मात्र है। समाज के मध्यम वर्ग के लोग जिनसे नैतिकता, दूसरों के प्रति सहानुभूति एवं अन्य मानव मूल्यों के प्रति सजगता की स्वाभाविक अपेक्षा रहती है, अपने आस-पास के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की ओर क्यों ध्यान नहीं दे पाते जबकी मध्यम वर्ग की आर्थिक स्थिति में आशातीत सुधार हुआ है।
उदाहरणार्थ, यदि हम अपने आस-पास नजर दौड़ाएं तो ऐसे अनेक बच्चे दिखाई पडेंगे जिनके पास स्कूल जाने के लिए फीस, किताबें, डेªस आदि नही है। गरीब माँ-बाप के पास प्रचुरता से केवल संताने ही मिलती है। अतः एक से अधिक बच्चों में एक या दो को पढ़ाने की हिम्मत तो माता-पिता जुटा लेते हैं पर शेष का उपयोग आजीविका के क्षेत्र में हाथ बंटाने में ही किया जाता है। घरों में बर्तन-चैका, साफ सफाई करने वाली महिलाएं हों या रिक्शा चलाकर पेट पालने वाला व्यक्ति हो या फिर ठेले पर सब्जी बेचने वाला इंसान हो या फिर कोई दैनिक मजदूर, गरीबी की मार को झेलते इन लोगों के बच्चे अपने भविष्य का कोई अच्छा सपना भी नहीं देख पाते। यदि हम अपने आसपास नजर घुमाएं तो ऐसे कई पात्र हमारे सामने स्वतः आ जाएंगे जिनकी थोड़ी से मदद करके हम उनका भविष्य संवार सकते हैं और यदि आप गणना करके देखें तो इस कार्य के लिए जो धनराशि व्यय होगी, वह आपकी वार्षिक आय के सापेक्ष नगण्य होगी। इतना ही नहीं, यदि हम अपनी आय के कुछ हिस्से का उपयोग शहर के अनाथालयों में रहने वाले बच्चों की बेहतरी के लिए खर्च कर सकें तो निःसंदेह इन बच्चों में पलने वाली हीन भावना और समाज के प्रति स्वाभाविक आक्रोश भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगेगा। ऐसे सभी बच्चे एक दिन निश्चित रूप से देश का भविष्य बनेंगे। एक बार प्रयास करके देखिए आपकी दृष्टि कितनी दूर तक जाती है, आपके हाथ कितने लंबे हैं। एक भी अभावग्रस्त बच्चे को सहारा देने का सुख क्या होता है- क्या आप अनुभव करना नहीं चाहेंगे?

राकेश चन्द्रा
लखनऊ

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