ग्राम टुडे ख़ास

मैं केहि समुझावौं

वीणागुप्त

उसका  नाम  शनिवार था।
मैला-कुचैला, रूखे उलझे  बेतरतीब बाल। गंदा कुर्ता, चीकट धोती, नंगे  बिवाई भरे पाँव।आबनूसी  रंग। अपने  इस रूप में  वह बहुत भद्दा, फूहड़ और मूर्ख नज़र आता था। लेकिन वह ऐसा  था नहीं, यह मुझे बाद  में  पता चला। वह  मुहल्ले के  लोगों  का दान पात्र था। पूरा मुहल्ला  हर शनिवार  को उसकी प्रतीक्षा  करता।  सुबह ठीक  छह बजे उसकी आवाज़  सुनाई  पड़ती,”शनि का दान, महा कल्याण।” आवाज सुनते ही सारे मुहल्ले के दरवाजे खुल जाते। खुलते भी क्यों नहीं, हमारे  महल्ले  में आस्तिक जो बसते थे। वैसे चाहें कभी किसी मदद न करें,पर शनि  का  दान देने में  कभी नहीं चूकते थे।  वैसे उनकी सोच सही भी थी ।अब बताइए, केवल एक दो  रूपल्ली में  शनिदेव के प्रकोप  से बचने का,  स्वर्ग में अपनी  सीट  के शर्तिया  रिजर्वेशन  की गारंटी  पा जाने, का, इससे सस्ता उपाय कुछ नहीं  हो सकता  था। शनिवार को  दान देना उनकी  मजबूरी और डर दोनों  ही था।
          महंगाई  की बढ़त देखते हुए  दान देने  के रेट में भी  बढो़तरी हो  रही  थी। पहले  दिया जाने वाला चवन्नी, (कभी कभी खोटी)और अठन्नी  का दान अब रुपया, दो रुपये  हो गया  था। मेरे घर में  भी  शनिवार  को दान देने  की  होड़ सी लगी रहती थी। पत्नी  आदर्श  भारतीय  महिला  थी। घर का कल्याण करने  के  लिए  दान पुण्य  के  क्षेत्र में  हद से  गुजर  जाने वाली। शनिवार  को  दान  दिए बिना किसी  को  चाय तक नसीब नहीं  होती  थी।
मेरे बेटे  -बेटियाँ  भी  इस काम में  मां  से दो कदम आगे थे। रोज देर से जागने वाली मेरी ये  संतानें शनिवार  को सवेरे ही जाग जातीं।जैसे ही  शनि की आवाज़  सुनाई  देती,दोनों बच्चे दरवाजे  के बाहर  भागते, “शनि अंकल, शनि अंकल ये  लो।”
बड़ा बेटा दो का सिक्का देता, छोटा पांच का, और श्रीमती  जी दस के नोट की बलि चढ़ातीं। उसकी मैली कुचैली  लोहे की बाल्टी में  सरसों काएक कटोरी तेल डालतीं और महल्ले  में  अपनी दानवीरता का ढिंढोरा पीट, संतुष्टमना रसोई का रुख  करतीं। प्रति सप्ताह सत्रह रूपयों और तेल की बर्बादी  देख मैं भुनभुनाता,”क्या दुनिया भर के फालतू  के चक्करों में  पड़ी रहती हो। अपने  साथ साथ  बच्चों को भी बिगाड़ रही हो। पत्नी के सिरपर शनि सवार हो जाता।माथे पर हाथ मार टिपीकल मंथरा वाले  अंदाज़ में  कहती कहाँ भाग फूटे हमारे। अरे आप खुद  तो पूरे नास्तिक  हो। मेरा ज़रा सा धर्म कर्म इन्हें  नहीं  सुहाता। बच्चों  को  दो अच्छी बातें सिखा रही हूँ,तो कहते  हैं  बिगाड़ रही हूँ। वह देरतक भन्नाती रहती। मैं कभी सुनता, तो कभी टीका टिप्पणी  भी करता,” छि, कितना मैला कुचैला है यह शनिवार। लगता  है  सालों से  नहीं  नहाया। देखते  ही घिन आती है। पता है  शास्त्रों में  लिखा है कि दान सुपात्र को देना चाहिए। ” “अरे रहने दो अपना  ज्ञान  अपने  पास। कंजूस कहीं  के। दान दान ही होता है देखा नहीं सारे मुहल्ले  वाले  देते हैं। “कहते  हुए वह रसोई में  चली जाती। बच्चे  अलबत्ता  बहसने लगते। ” पापा आप शनि अंकल  को अंडर एस्टीमेट मत करोगघ की  है। साल भर
के  त्यौहारों की  तिथियां  उन्हें याद हैं। और आप को  तो हमारा जन्मदिन  तक याद नहीं  रहता।” ।” “छोटा हँसकर मेरी ओर देखता। मैं  मन ही मन सोचता कि भइया,यहां तो अपना  ही सिक्का  खोटा है।यह नहीं  सुधरने वाले। क्यों  न शनिवार को ही  सुधारा जाए।
       यही सोच  मैंने पत्नी से  कहा कि  अगली बार जब शनिवार  आए, तो उसे  मुझसे मिलने के लिए  कहना। पत्नी ने मुझे हैरानी से देखा ।बोली, “क्या करेंगे उससे  मिलकर? “.”कुछ नहीं  दो चार बातें करेंगे ” बच्चे  बोले, वाह पापा, आप उनका इंटरव्यू  लेंगे। क्या बढ़िया  आइडिया  है। मैंने अपनी  पत्रकारिता को इस स्तर पर उतरते  सपने  में  भी  नहीं  सोचा  था। बड़ा बोला, पापा इंटरव्यू छुट्टी  वाले  दिन का रखना,।हमें  भी उनसे दो एक बातें पूछनी हैं। ” ठीक  है, मैंने कहा।, “और हाँ,इन शनि महाशय को बता देना, जरा नहा वहा कर आए। लेकिन अगले शनिवार  तक इंतजार  नहीं  करना पड़ा।  रविवार  को  सवेरे ही  उसकी आवाज़  सुनाई  पड़ी।” रवि का दान, महाकल्याण।आज पूरनमासी है। जो दे उसका  भी भला, जोन दे उसका –“बच्चों  ने जैसे  ही  उसकी आवाज़  सुनी, फौरन बिस्तर से  कूद बाल्कनी  की ओर भागे।”शनि अंकल, शनि ऽऽऽ अंककऽऽल”मैंने खीझकर पत्नी  से कहा, “अपनी इन बेअक्ल औलादों को। समझाओ।उसे  ग्यारह  बजे से  पहले  का टाईम  मत देना। अब जल्दी  जाओ, कहीं  तुम्हारे  लाड़ले उसे  अभी ही न ले  आएं। “
ठीक  ग्यारह बजे दर वाजे पर दस्तक हुई। मैं ने  ऊँची आवाज़  में  कहा,  आ जाओ  भई। और हाँ, अपना झोला और बाल्टी  बाहर रख आना। मेरी अनुमति  पाकर वह अंदर आ गया। बड़ी शिष्टता से बोला, ” नमस्कार  बाबूजी। “और मेरे बैठो कहने पर वहीं  फर्श पर बैठ गया। मैं ने कहा भाई वहाँ नहीं, यहाँ कुरसी  पर बैठो। ” धन्यवाद  बाबूजी, कह कर वह कुर्सी  पर विराजा। मैं ने मन ही मन उसके  आचरण की तारीफ़ की। औरकुछ कहने को ही  था  कि  साईड वाले दरवाजे से झाँकती तीन जोड़ी आंखें दिखाई दीं। मैं ने आँखों  ही आँखों  में  उन्हें  घुड़का। उनके टलते ही मैंने सीधा सपाट प्रश्न  दागा, ” हट्टेकट्टे हो, यूँ भीख मांगते शर्म नहीं  आती? “वह बेहिचक बोला, ” कैसी शर्म? यह तो मेरा काम है। काम में  कैसी शर्म?”मैं  हतप्रभ हो गया। भीख मांगने को मैंने
इस नजरिए से नहीं देखा था। बोला, “अरे भ ई, यूं चिथड़े  लटकाकर ,घर-घर जाकर हाथ फैलाते को काम कहते हो। तुममें कुछ आत्म सम्मान है या नहीं। कोई और काम करो, जिससे समाज में  इज्ज़त  बढ़े। “
         वह जैसे  मेरा मखौल करता हुआ बोला, “आत्मसम्मान तो बड़े लोगों की चीज है, हमें  इससे कुछ लेना देना  नहीं। हमारे  लिए  तो भूख मिटाना ही सबसे बड़ा  काम  और सम्मान है। हम यह काम बचपन से करतेआ रहे  हैं। और सच बताऊँ बाबूजी, इससे ज्यादा  आराम का काम  कोई और नहीं। आवाज सुनते ही बडे से
बड़ा मूंजी भी गांठ खोल देता है। ” “क्यों नहीं, लोगों का इह लोक जो सुधार रहे  हो। दो चार रूपल्ली में  स्वर्ग लोक का रिजर्वेशन  जो करवा रहे हो। ‘मैं ने  व्यंग्य किया। ” बाबूजी, लोगों  की बात  मैं नहीं जानता। हां, अपना, लोक जरूर सुधार रहा हूँ। आप लोगों  की  दया से  खाने  पीने की  कोई कमी नहीं  है। कुछ बच ही जाता है। “मुझ से तो  यही अच्छा  है  बचत तो  दूर कीबात, महीने  का आखिर  आते आते किल्लत हो जाती है । मैं ने सोचा। फिर बोला,” कुछ पढ़े लिखे भी हो? ” हां बाबूजी  दसवीं  पास की है, उसने  गर्व से कहा। मैं एम एस सी  करके इस गर्व की  अनुभूति नहीं कर पाया।
“इसी दान से काम चलाते हो, या और कुछ भी करते  हो।” बाबूजी,सवेरे तो यही करता हूँ, लेकिन शाम को निशाने बाजी का खेल खिलवाता हूं। मुझे  कुछ  समझ नहीं आया तो उसने  समझाया। बच्चों  से  गुब्बारों पर निशाने
लग वाने का खेल। “वह हँसा, अब तो घर जाकर सो जाऊंगा, सवेरे जल्दी  उठना पड़ता है न। “
मैंने उसे  धिक्कार  भरी  नजरों से देखा,” छोडो़ यह बेगैरत  काम,  यह मेरा  कार्ड रखो। अगले सोमवार  को  मेरे आफिस में  आना। तुम्हारे लिए किसी  काम का इंतजाम  करता हूँ। ” “नहीं बाबूजी, हमारी मजे में  कट रही है।हमें बाबूगीरी नहीं करनी। अब हम अपनी  मर्जी  के मालिकहैं, गुलामी हमसे नहीं  होगी। अब चलूँ?” कहकर वह नम्स्ते कर के  चलने को हुआ ही था कि पत्नी  जी चाय नाश्ता ले कर आ गईं। ,”चाय पिओ, शनि महराज। “वह चाय सुड़कने लगा। मैं ने फिर  पूछा, घर में  कौन-कौन है। मेरा मतलब बीवी बच्चे। “” जी हाँ, बीवी है।माँ है,और चार बच्चे हैं। “
“उन्हे  पढा लिखा रहे हो या नहीं। आजकल तो  सब मुफ्त मिलताहै। “

“क्या करेंगे साहब जी, बच्चों  को पढ़ा लिखा कर।
ऐसे ही कोई काम  कर लेंगे। मेरा समाज सुधारक जाग गया।”अरे, अपनी  ज़िंदगी  तो खराब की, अब बच्चों  की तो  मत बिगाडो़, पढ़ लिखकर नौकरी मिल जाएगी ” शनिवार ने  चाय का कप दीवार से  सटा कर रखा और कहा ” धन्यवाद बाबूजी। अब चलूँ, आपकी  बात  याद रखूंगा और अपना डोल और थैला उठाकर चला गया। ” मैं कुछ सोचता सा बैठा रहा कि श्रीमती जी आईं। बोली, “हो  गया  समाज सुधार। इतना भी नहीं
हुआ कि बेचारे को पांच दस रूपए ही दे देते। कुछ पुण्य  कमा लेते।” मैं  उसे  अनसुना  कर चुप बैठा रहा। सोच रहा था शायद  उसे मेरी बात समझ आए और अगले शनिवार  वह आए ही नहीं। माना कि  यह भी  एक काम है, मगर कौन करना चाहेगा इसे?
      सारी रात इन्हीं  विचारों में  उलझा सो तक नहीं  पाया। सपना  देखता रहा, शनिवार  साफ सुथरे कपड़े पहने खड़ा  है। मुझसे कह रहा  है, ” बाबूजी, आपने मेरी आँखें खोल दी हैं।मुझे
कोई काम दिलवा दीजिए।” वगैरह—- वगैरह।सहसा मेरा सपना टूट गया। शनिवार  की आवाज़  मेरे कानों में  साफ सुनाई दे  रही  थीं, ” सोम का दान, महाकल्याण। आज प्रथमा है, जो देउसका भी भला, जो न दे उसका  भी —–।”मैंने  उठकर
बाल्कनी  से नीचे  झांका।
परम आश्चर्य। आज शनिवार अकेला  नहीं  आया था। उसका दसेक साल का लड़का  भी  उसके  साथ था। वैसा ही मैला-कुचैला। चीकट कुरता लटकाए। झोला टांगे और तेल का डोल लिए। मेरा मुन्नू अपनी  माँ से कह रहा था, “मम्मा,मिनि शनिवार। माँ, इसे मेरी कोई ड्रेस दे दो न। ” बच्चों  मैं  दान और सहानुभूति  की होड़ लगी थी। छोटे शनिवार  को  देख पत्नी  की  दया का झरना वेग से फूट पड़ा था। मैं  शनिवार  से  आँखें  चुराता, ओट में  हो गया  और सोचने लगा” मैं  केहि समुझावौं।

वीणागुप्त
नई दिल्ली

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