ग्राम टुडे ख़ास

रेखा रानी की कलम से

कृषिका

यहां खेत में ज़िंदगी कैसे ,खिलखिलाती है।
तन सना हुआ मृदा से, वो धान लगाती है।
मनमोहक दृश्य है, यहां धान रोपाई का।
देहरी पर खड़ा यौवन, लगता सौदाई सा।
आभूषण मंडित तन, प्रकृति की सगाई सा।
मधुवन सा बना जीवन मेहनत रंग लाई ना।
गौरी यूं आह्लादित हो कैसे इठलाती है।
तन सना हुआ मृदा से वो धान लगाती है।
मेरे प्राण बसे सचमुच, इस धान की खेती में।
मिलती हैं निधि अतुलित ,इस प्यारी खेती में।
जीवन के सभी सुख हैं मेरे इसी माटी में।
जीऊं तो यहीं जीऊं मरूं भी इसी माटी में।
मेरी यही कामना है, वो धान लगाती है।
रिमझिम सी फुहारों में, चमचम चमके चपला।
हरियाली सी बिखरी हुई, गौरी यूं सजी सबला।
धरती की गोदी में,कृषिका का नेह पला।
बादल यूं बरस बरस ,अंबर की ओर चला।
रेखा वो खुश हो कर बस प्राण उगाती है।
तन सना हुआ मृदा से वो धान लगाती है।

पद्य (सायली छंद)

स्वर्ग
वह घर
जहां चहकती हों
बेटियां चटका
सम।

स्वर्ग
वह घर
जहां महकती हों
फूलों सम
बेटियां।

स्वर्ग
वह घर
जहां गूंजती हों
फिजाओं में
किलकारियां।
स्वर्ग
वह घर
जहां पूजनीय हैं
माता पिता
गुरुजन।

स्वर्ग
वह घर
जहां शिक्षा की
महकती हों
क्यारियां।

स्वर्ग
वह घर
जहां घर से
प्यारे हों
नर।

स्वर्ग
हो जाएगा
यह सारा वतन
शिक्षित होगा
आमजन।

स्वर्ग
हो जाएगा
यह सकल राष्ट्र
प्रहरी होगा
आमजन।

स्वर्ग
हो जाएगा
जर्रा जर्रा वतन
बेटा लाएगा
इंकलाब।

रेखा
होगा स्वर्ग
धरा पर अवतरित
जब जन्मेगी
मानवता।

गज़ल


बेवफ़ाई अगर तुम करोगे सनम,
याद रखना यूं हम बिगड़ जाएंगे।
प्यार से जान भी मांग लो तुम सनम,
हंसके सूली पे भी यारा चढ़ जाएंगे।
तुमने ख़ुद ही दिए इतने गहरे ज़ख्म,
बनके नासूर गहरे ये सड़ जाएंगे।
अपना समझ हमने बांटे थे गम।
रुसवा महफ़िल में होने से मर जाएंगे।
दिल शीशा मेरा बिखरा है टूटकर।
फासले इस तरह और बढ़ जाएंगे।
देख रोते हमें रेखा पिघले नहीं,
यह हकीक़त कि हम यार मर जाएंगे।

रेखा रानी
विजयनगर गजरौला,
जनपद अमरोहा,उत्तर प्रदेश।

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