ग्राम टुडे ख़ास

सौंदर्य

साधना मिश्रा

अस्तु, यदा कदा ऐसे विषयो पर चर्चा कर लेने से हम वास्तविकता से जुड़े रहते है ,।भटकाव से बच जाते हैं
सौंदर्य क्या है ?..सीधे सरल शब्दों में तो यही कहा जायेगा कि…. जो हमें आंखों से दिखाई देता है अच्छा लगता है , जिसको देखने की चाहत हर मानव में होती है,, जिसका रसास्वादन कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छानुसार अपने अंतर्मन में समाहित कर लेना चाहता है, और इतना मस्त हो जाता है कि उससे बाहर आने में उदासीनता का अनुभव महसूस करता है, इस प्रकार तन और मन को जो भाये, सुखद लगे, पाने की चाहत बनी रहे …वही सौंदर्य है ।
किंतु मैं कहना चाहूंगी कि… वास्तव में सौंदर्य किसी भी व्यक्ति की संवेदना भावनात्मक गुणधर्म और मानक मूल्यों का विस्तृत अध्ययन है जिसमें कलात्मक कृतियों का रचनाओं का संस्कृति और प्राकृतिक मूल्यों का आंकलन करने का पूरा शास्त्र छिपा होता है ।
मैं सौंदर्य को दो भागों में रख कर देखना चाहती हूं । बाह्य यानी बाहरी सुंदरता और आंतरिक सुंदरता……
बाह्य यानी बाहरी सुंदरता में भी हम तीन प्रकार की सुंदरता देखते हैं निर्मल स्वास्थ्य प्राकृतिक , ,हरियाली से युक्त स्वच्छ वातावरण की पर्यावरण की सुंदरता ,।
दूसरा भौतिक संसाधनों से युक्त सुंदरता जो हमें स्वयं को अच्छी लगती है हमारे आसपास होती है और हम गाहे बगाहे उन सौंदर्य प्रतीकों को संकलित करने का प्रयास भी करते रहते हैं।
और 3सरी ..कृत्रिम बनावटी,. सुंदरता जो हमें खुद को और अधिक संवारने के लिए ब्यूटी पार्लर से प्राप्त होती है।
और इसीलिए मेरा मानना है कि ये बाह्य सुंदरता काया और माया पर आधारित होती है, जो कि सदैव परिवर्तनशील होती है बाहरी सौंदर्य हमेशा व्यक्ति की आवश्यकताओं पर , स्वार्थ पर ही आधारित होती है। इसीलिये नश्वर और अस्थिर होती है, ।
बाहरी सुंदरता के रूप में ही मैं आपको एक बात कहना चाहूंगी कि आप स्वयं अनुभव करते होंगे कि हम लोग सौंदर्य की अनुभूति अलग अलग व्यक्ति विशेष में अलग-अलग स्थान और कार्य विशेष में अलग अलग तरीके से ही अनुभव करते हैं यही कारण है कि हम कभी भी एक ही व्यक्ति वस्तु स्थान विशेष के प्रति एक जैसी धारणाएं कभी नहीं रख पाते वे परिवर्तित होती रहती है । हमे अलग अलग कारणों वश अलग अलग व्यक्ति, वस्तु, स्थान अच्छे लगते हैं सुंदर लगते हैं। और कार्य समाप्ति के बाद शायद सब समाप्त.।

     अब मेरी बात   आती है दूसरे भाग की तरफ...........
          आंतरिक सुंदरता ....  जिसमें विचारों की आंतरिक भावनाओं की सुंदरता निहित होती है ।  मेरे मतानुसार आंतरिक सौंदर्य को महसूस करने का जिसे अभ्यास हो जाएगा उसको ही साक्षात परमात्मा का ,अपने इष्ट देव का,सौंदर्य  नजर आएगा और वही सत्य है शिव है, सुंदर है जो सत्यं शिवं सुंदरं होता है वही अनंत और  शाश्वत  होता  है ।   और इसी के द्वारा आंतरिक सौंदर्य की  विद्वान लोग इसकी सात्विक, दार्शनिक और मार्मिक  विवेचना भी करते हैं .....,...…....
     आप देखिए  स्वयं महसूस करेंगे कि सौंदर्य प्रतियोगिताओं में भी  बाहरी, शारीरिक सौंदर्य के साथ-साथ आंतरिक मन के सौंदर्य को विशेष रुप से आंका जाता है , समझा जाता है ,  रखा जाता है   और उसी के आधार पर विजयी  भी घोषित किया जाता है । इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि  व्यक्ति मन से सच्चा और सुंदर होगा, तो समाज को भी कुछ सार्थक ही मिलेगा 

आन्तरिक सुंदरता से परिपूर्ण व्यक्ति धीर,गंभीर, मनस्वी और समाज को सकारात्मक विचार देने वाले होते हैं।
तो निश्चित रूप से यही मानना पड़ेगा कि बाहरी सौंदर्य, सुंदरता ही मनोबल को बढ़ाती हुई शाश्वत होती है अमर होती है।
अगले जन्म में भी हमारे संस्कारों के रूप चली जाती है , और उसी के अनुसार हमारा आचरण व्यवहार भी परिलक्षित होता है। तो हमें सदैव आंतरिक सौंदर्य को ही जानना पहचाना, और अपनाना चाहिए जिससे हम उस शाश्वत सौंदर्य में लिप्त होकर संस्कारों के साथ अगले जन्म के शरीर में भी अपनी ज्योतिर बिंदु अमर आत्मा के साथ जा सके नए कवच में प्रवेश कर सके।प्रवेश कर सके ।
इसी आन्तरिक सौंदर्य को अपनाने से, महसूस करने से हमारी वसुधैव कुटुम्बकम की भावना मजबूत होती है, हम अभ्यस्त हो जाते हैं तो निश्चित रूप से हमारा व्यवहार सबके प्रति एक समान हो जाता है,। सबसे प्रेम सद्भाव का व्यवहार रहता है ।
अपने पराये,ऊँच नीच ,का भेदभाव समाप्त हो जाता है।हम स्वयं और हमारा पूरा वातावरण ख़ुशनुमा सौंदर्य की रश्मियों से जगमगा जाएगा।
वास्तव में आंतरिक सौंदर्य स्वयं में समाज के लिए एक अनूठा, अनमोल स्वरूप है, उदाहरण है। विधाता का दिया उपहार है ,जो किसी किसी को ही मिलता है, ।
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     इसी के साथ अपनी वार्ता  को  उत्तर  प्रतिउत्तर आप पर छोड़ कर मैं विदा लेती हूँ 

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