ग्राम टुडे ख़ास

उत्सव का समाजशास्त्र

राकेश चन्द्रा
हमारे देश में उत्सव मनाने की परम्परा हजारों साल पुरानी है। छोटे-छोटे अवसरों पर हमारी उत्सवधर्मिता स्वतःस्फूर्त होकर हमारे जीवन में खुशियों के रंग भर देती है। अनेकानेक त्योहार, पर्व, सांस्कृतिक एवं सामाजिक आयोजन, जन्म से लेकर मृत्योपरान्त विभिन्न संस्कार उक्त अवधारणा का जीवन्त प्रतीक हैं। ऐसे सुअवसरों पर सामाजिक सहभागिता का विशिष्ट स्थान है। वस्तुतः लोगों को जोड़े बिना ऐसे आयोजन बेरंग लगते हैं। हमारी महान संस्कति में सुख-दुख को समान रूप से बांटने की परम्परा है। कालानुक्रम में, हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर में हमने बहुत सारे ऐसे आयोजनों को भी अपने से जोड़ लिया है जिनका सम्बन्ध पाश्चात्य संस्कृति से है। उदाहरणार्थ अब घर-घर में जन्मदिन मनाने की परम्परा परवान चढ़ रही है। प्रायः ऐसे सभी आयोजनों में में अपनी सामथ्र्य के अनुसार पैसा खर्च किया जाता है और आर्थिक रूप से समर्थ लोग अच्छा-खासा धन व्यय करते हैं। हमारे धार्मिक आयोजनों, यथा मुंडन संस्कार, बरसी, तेरहवीं आदि में काफी संख्या में मित्रों, परिचितों एवं रिश्तेदारों को आमन्त्रित किया जाता है और भोजन का प्रबन्ध किया जाता है। इसी प्रकार बच्चों के जन्मदिन पर भी बड़े पैमाने पर सजावट, खान-पान आदि व्यवस्थाओं पर धन का व्यय किया जाता है। आर्थिक संपन्नता में वृद्धि के साथ-साथ इन समारोहों की भव्यता भी बढ़ी है।
यहाँ पर उल्लेखनीय है कि ऐसे आयोजनों में हम अपने सीमित सामाजिक दायित्वों की पूर्ति तो करते हैं परन्तु अपने वृहत्तर सामाजिक दायित्वों की पूर्ति की ओर हमारा ध्यान शायद नहीं जा पाता है। ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की अवधारणा से ओत-प्रोत हमारी शानदार संस्कृति में समाज के ऐसे अनेक वर्ग ऐसे भी हैं जो आर्थिक एवं सामाजिक रूप से अशक्त हैं- उन तक पहुँचकर उन्हें अपनी खुशी में सहभागी बनाना भी हमारा ही दायित्व है। इसी प्रकार इस पृथ्वी पर विचरण करने वाले अन्य जीव-जन्तु भी हैं जिनका जीवन भी काफी हद तक हमारी अनुकम्पा पर ही आधारित है। सड़कों पर घूमने वाले आवारा पशु हों या स्थान-स्थान पर स्थित गौशाला हों, बेजुबान पशु भूखे न रहने पायें, यह भी हमारा वृहत्तर सामाजिक दायित्व है। इसी प्रकार अनाथालयों एवं वृद्धाश्रमों में रहने वाले बच्चे एवं वरिष्ठ नागरिकों के प्रति भी हमारे कर्तव्य एवं सामाजिक दायित्व हैं जिनका निर्वहन परम आवश्यक है। क्या ही अच्छा हो कि हम अपनी आय का कुछ हिस्सा उपरोक्त वर्णित आयोजनों के अवसरों पर किसी अनाथालय अथवा गौशाला जाकर उनके भोजन की व्यवस्था के निमित्त व्यय कर दें! उदाहरण के लिये, यदि हम अपने बच्चे के जन्मदिन पर होने वाले व्यय का कुछ अंश उपरोक्त कार्य के लिये व्यय कर दें तो शायद मन की संतुष्टि भी मिलेगी खुशी के साथ-साथ! अच्छा तो होगा कि हम अपने बच्चे का जन्मदिन अनाथालय जाकर वहाँ रहने वाले बच्चों के साथ मनायें! इससे बच्चों में अच्छे संस्कारों का बीजारोपण होगा, तथा हमारे सामाजिक दायित्वों की पूत्र्ति भी होगी। इसी प्रकार किसी अन्य अवसर पर किसी गौशाला में जाकर पशुओं के लिये कम से कम एक दिन के भोजन की व्यवस्था करके जितनी संतुष्टि मिलेगी वह कल्पनातीत है। यह तो मात्र उदाहरणार्थ हैं! समाज में चारों ओर ऐसे अनेक स्थल फैले हुए हैं जहाँ पर रहने वाले लोगों की ओर बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है। चाहे वो कुष्ठाश्रम हों या मलिन बस्तियाँ हों या कोई अन्य आश्रय स्थल, सभी को हमारी उदारमना दृष्टि की आवश्यकता है। हम अपने त्योहारों, पर्वों और सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों को और अधिक सार्थक, सोदे्दश्य एवं सुखद बना सकते हैं। जिस दिन हम यह सोच विकसित कर लेंगे समाज पहले से अधिक सुन्दर एवं समरसता से परिपूर्ण दिखायी देगा। आइये नवविहान का श्रीगणेश करें!
राकेश चन्द्रा
लखनऊ

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