ग्राम टुडे ख़ास

उधार (मंगनी ) के समान से शादियां हो जाती थी..!

डॉ रमाकांत क्षितिज

एक वह भी ज़माना था जब पूरा विवाह ही लगभग उधार के समान से हो जाया करता था.मेरे बचपन मे गांवो में विवाह के समय लोगो से बिस्तर तक उधार मांग लाया जाता था.

जो थोड़े सम्पन्न थे वे दूसरों के लिए चादर,दरी,रजाई गद्दा अलग रखते जो अन्य लोगो को मंगनी के रूप में दिया जाता.हर बिस्तर पर एक कोने में उसके मालिक का नाम पेन से लिखा रहता.यह नाम भी घर के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति का होता.

मांगने वाला एक कॉपी लेकर मालिक का नाम व बिस्तर संख्या लिखता.चारपाई भी उधार मिल जाती थी.विवाह के एक दिन पहले यह एक विशेष काम सब को करना पड़ता था.बर्तन भी उधार ही मिलता था.

हालात तो यह थे कि एक ही जोराजमा (विवाह के समय दूल्हे की पोशाक ) भी उधार ही लाई जाती.किसी किसी के पास ही नया सीलाया जाता.कुछ एक समान को छोड़कर बहुत सी चीजें उधार की ही होती.

आज यह सब हो सकता है पिछड़ेपन की निशानी कहा जाय. पर इन्ही सब वजहों से विवाह तब सँस्कार था.जिसमे हर जाति किसी न किसी तरह शामिल होती.विवाह के अवसर पर हर जाति को कुछ न कुछ भेंट दी जाती.

कभी कभी तो अपनी इन्ही प्रजा के लिए दोनों पक्ष आपस मे बहस भी कर लेते.सिर्फ हिंदू जाति ही नही,बल्कि मुस्लिम महिला जब तक दुल्हन को चूड़ी न पहना दें.तब तक दुल्हन विदा न होती.

कभी कभी तो चुड़िहारिन के इंतज़ार के चक्कर मे घण्टो लोग इंतजार करते.विवाह व्यक्तिक होते हुए भी एक सामाजिक उत्सव बन जाता था.आज भी कुछ गांवो में मट्ठा (छास ) उधार लाया जाता है.उस दौर में प्रकाश के लिए उपयोग में लाई जानेवाली गैस भी उधार ही लायी जाती थी.

यहाँ तक की पानी का ड्रम भी,लोग उसपर अपना नाम लिखा देते थे.ताकि कई लोगो के यहाँ से लाया गया ड्रम घालमेल न हों जाय. लोगों को ड्रम मालिक का नाम पता चले सो अलग.जाजिम भी उधार में ही मिल जाता था.

बैलगाड़ी,ऊंट,हाथी,घोड़ा भी मुफ्त में मिल जाते थे.विवाह में जानवर ,पेड़ पौधें, खेत, कुआं सब कुछ की ज़रूरत उस दौर में होती थी.हाथी पर बैठकर दूल्हे के फूफा और जीजा की उस ज़माने में जो धाक थी.

आज करोडों की कार में कहाँ ! डाबर का महकउआ तेल और नूरानी तेल की महक आज की परफ़्यूम में कहां. बारातियों की पसन्द के तेल थे.कोई कोई कियो कर्पिन तेल भी लगाता.

हाथ की कलाइयों पर जब इत्र लगती तो हाथ धोने का मन न करता.ठीक वैसे ही जैसे अच्छी मिठाई खाने के बाद बचपन मे पानी पीने का मन न करता.स्वाद चले जाने का डर रहता.

चिल्लर में मिलने वाली विदाई ,भतखाई, खिचड़ी की खवाई, कई दिन बार बार गिनी जाती. विवाह की तैयारी सालों से शुरू होती, विवाह के बाद महीनों उसकी चर्चा होती.

विवाह सिर्फ दो व्यक्तियों का ही नही,दो परिवारों का ही नही,एक सामाजिक उत्सव बन जाता था।

संकलन

विनोद कुमार सीताराम दुबे

संस्थापक

सीताराम ग्रामीण साहित्य परिषद

एवं इंद्रजीत पुस्तकालय

जुडपुर रामनगर विधमौवा

मड़ियाहूं जौनपुर उत्तर प्रदेश

100% LikesVS
0% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!