साहित्य

अंतर्मन का दीप

इंद्र देव त्रिवेदी

जो प्रकाश से वंचित जन हैं,
उनका मन हरषायेगा ।
अंतर्मन का दीप जले तो,
हर दीपक मुस्कायेगा ।।

परम ब्रह्म का रूप दीप है,
सबको राह दिखाता जो ।
किरण – वलय की भांति दीखकर,
खुद प्रेरक बन जाता जो ।।

छोटा-सा यह ज्योतित दीपक,
लहर-लहर लहरायेगा ।।
अंतर्मन का दीप ……………

माना बाहर अंधियारा है,
जो मंजिल अवरुद्ध करे ।
पर भीतर का यह उजियारा,
सभी तमस को शुद्ध करे ।।
अंतर्दृष्टि अगर हो विकसित ,
सबको सच दिखलायेगा ।।
अंतर्मन का दीप……………….

सत्वगुणों से युक्त दीप ये,
हर आनंद जगाता है ।
रख दोगे जिस जगह वहाँ का,
अंधकार भग जाता है ।।
कर्म सुनिश्चित है दीपक का,
हर रहस्य समझायेगा ।।

अंतर्मन का दीप …………….

- रचयिता-
          इंद्र देव त्रिवेदी

214, बिहारीपुर खत्रियान, बरेली

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