साहित्य

अच्छा रिश्ता

लघुकथा

मंजुला शरण


जिन्दगी के रास्ते भी समझ से परे होते हैं, जिनपर ऊपर वाले का ही अधिकतम नियंत्रण होता है । सभी को उसी के इशारे पर चलना पड़ता है ।
जिस घर में शहनाई बजने वाली थी ,जो बेटी दुल्हन बन कर विदा होने वाली थी, वही अर्थी पर विदा हो चुकी थी ; एक मनहूस एक्सीडेंट में ।
सारी तैयारियाँ लगभग पूरी हो चुकी थीं , बस ऑर्डर किया गया लंहगा फिटिंग के लिए देखना था , पार्किंग बुटीक के पास नहीं था । सड़क पार करते समय तेज कार से टक्कर और दिव्या का वहीं दम तोड़ना—‘ माता-पिता को तोड़ गया और परिवार को हत्प्रभ कर गया ।
आज तेरहवीं संपन्न हुई थी।
दिव्या की छोटी मम्मी ने किसी तरह जेठानी ( दिव्या की मम्मी ) को कुछ खिलाने में कामयाबी पा ली थी ।
सब कुछ सामान्य हो गया सोच कर निश्चिंतता अनुभव करते हुए, देवरानी ने जेठानी से अपनी बात शुरु की — जीजी ! होनी को यही मंजूर था । इंसान के वश में है ही क्या ? दिव्या तो अब वापस नहीं आ सकती है । पर हम इतना अच्छा रिश्ता भी तो नहीं छोड़ सकते हैं । दिव्या के जेवर और दहेज का अब क्या होगा ?
मेरी बेटी नव्या भी तो आप ही की बेटी है । अब बिना देर किये हमें इस रिश्ते में नव्या की शादी के लिए वहाँ कहना होगा ।
अधूरे रिश्ते की मातमपुर्सी में होने वाले समधी भी पास ही बैठे थे । हाथ जोड़ कर बोले माफ कीजिएगा बहन जी , आपकी तरह खून का रिश्ता तो हमारा नहीं है , पर इस अधूरे रिश्ते की ड़ोर में हम बंध चुके हैं।
हमारे परिवार में अभी इस साल शादी का कोई विचार नहीं है ।
आप देर मत कीजिए तैयारियों के साथ अच्छे रिश्ते की तरफ़ बढ़ जाइए ।

मंजुला शरण
राँची , झारखण्ड़ ‘मनु ‘

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