कहानीसाहित्य

अतिक्रमण

चन्द्रकान्त खुंटे “क्रांति”

साल्हे नामक गाँव मे मेरा एक मित्र रहता है जिसका नाम गुरुदयाल है उनके गाँव बिलासपुर से शिवरीनारायण के मुख्यमार्ग पर स्थित है जिसकी दूरी मेरे गाँव से लगभग पांच किलोमीटर है उनके घर मे एक बार पुस्तक लेने गया था,क्योंकि हम दोनो एक ही साथ पढ़ते है और शासकीय नौकरी की तैयारी भी साथ मे ही किया करते है। 

    उस दिन जब मैं उनके द्वार में पहुँचा तो देखा,घर के सामने गाय-बैल-बछड़े सब बंधे हुए है। जिसकी संख्या लगभग नौ से दस रही होगी। उन सबको देखकर मैं अंदर चला गया,मित्र से मिला। उसने अपने पत्नी को आवाज दिया।उसका नाम चाँद है वह “यथा नाम तथा गुण” पायी है देखने मे बहुत सुंदर-सुशील और सीरत उससे भी उजली है। उसने सबसे पहले मुझे पानी,फिर चाय फिर रोटी वगैरह लाकर रख दिये। वह दिन मुझे अच्छे से याद है तीजा का दूसरा ही दिन था,इसलिए रंग-बिरंगी रोटियाँ बनी हुई थी फिर मैंने सम्मान स्वरूप एक-दो निवाला निकाल कर खाया। मैं जब भी जाता हूँ तो भाभी चाय पिलाये बगैर नही भेजती है। हर बार गाय के दूध का बहुत स्वादिष्ट चाय पिलाती है वह बहुत शांत एवं गम्भीर स्वभाव की है। आदर- सत्कार के बाद मित्र से पढ़ाई-लिखाई की बात करते-करते अचानक से पूँछा कि क्या आपके गाँव में चरवाहे नही है?जो पशुओ को चराने के लिये लेकर जाते ? तो उन्होंने बताया कि हमारे गांव में चरवाहे है लेकिन चारागाह भूमि नही है ?मुझे सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ क्योकि चरवाहे लोगो को मैंने साल भर पहले ही पशुओं को चराने के लिए ले जाते हुए देखा था। उसी को स्मरण करके बोला,आपके गाँव तो बहुत बड़ा है इसका रकबा भी बड़ा होगा और फिर पिछले वर्ष तो मैं यहाँ के पशुओं को पश्चिम दिशा की ओर नाले के किनारे ले जाते हुए देखा था वह गोचर भूमि कहा गयी ? उस सब को तो लोगो ने खेत बना लिये है,केवल वही भूमि ही नही उसके अलावा लगभग पाँच एकड़ भूमि में भी कब्जा कर लिया है। 

      यह सुनकर मैं स्तब्ध रह गया मुझे अन्यन्त मर्मान्तक पीड़ा हुई।  फिर मैं दुःखी मन से पुस्तक लिया और मित्र से बिदा लेकर घर की ओर निकल पड़ा,तब रास्ते मे मैंने लौटते हुए सबके दरवाजे पर मूक पशुओं को बंधे हुए देखा,जिसे जाते समय शायद मैं ध्यान नहीं दे पाया था,सभी खूँटी में बंधे हुए थे कोई पुआल खा रहे थे,तो कोई दुःखी मन से बैठे थे,कुछ बछड़े रोड में इधर-उधर दौड़ा-भागी कर रहे थे। इस दृश्य को निरखते-निरखते जब मैं अपने गृह पहुँचा तो मित्र की एक-एक कही हुई बात स्मरण होने लगी,इन पशुओं की देखभाल करने में अब बहुत परेशानी होता है इस वर्ष जैसे-तैसे देखभाल कर देते है ,फिर अगले वर्ष से इसे नही रख पाएंगे। इनको किसी गरीब को दान कर देंगे। क्योकि आज के समय मे इसके कोई खरीददार भी नही मिलते है। इसके बाद हम लोग स्वतंत्र हो जाएंगे,जब तक माता-पिता घर मे है गउ रखने का सोचा था पर अब सम्भव नही लगता है,क्योंकि घर मे ही रखकर उनका देखभाल नही हो पाएगा। ऐसे रखने से मवेशी पर जुल्म होगा, हम पर पाप लगेगा जो हम लोगो से नही हो पाएगा। उन्होंने बताया कि माँ कहा करती है कि गउ रखने से घर मे बरकत आती है सुख-शान्ति फैलती है और क्लेश दूर होते है अर्थात इनके चरण लक्ष्मी स्वरूपा होती है। 

उन निरीह पशुओं की कल्पना मेरे मन मे बार-बार उभर आती थी मैं सोंचता हूँ कि मनुष्यों को भी कोठी में कैद कर दिया जाए,उसके खाने-पीने की वस्तु को छीन लिया जाए तो उनकी स्थिति कैसी होगी? लोग जीते-जी मर जायेंगे,पर मनुष्य स्वार्थी है वह दूसरों के बारे में नही सोंचते है। मित्र ने एक प्रमुख बात बताई थी कि वहाँ के आम -आदमी से लेकर पंचायत प्रतिनिधि तक गौचर भूमि में कब्जा किये हुए है इसलिये शासकीय भूमि से कब्जा नही हट पाता है। इस बात से मुझे गहरा धक्का लगा था क्योकि गांव के मुखिया लोग ही ऐसे करेंगे तो प्रजाजनों का क्या होगा ? इस बात को सोंचकर मैं बहुत दुःखी और चिंतित हो गया और सोंचने लगा कि पंचायत प्रतिनिधियों से इसका शिकायत करने पर भी हल नही निकलेगा। इसलिए कलम मैने कलम को चुना। 

         मुझे पुराने जमाने के लोगो की वह बात याद आती है,कि दरवाजे पर एक गउ के रहने घर की मरजाद बढ़ती है पर उन्हें क्या पता था कि भविष्य में सब गउ दरवाजे पर ही बंध जाएंगे ?वर्तमान परिवेश में लोग सोंचते है “गाय न गरु सुख होय हरु” अर्थात आज के समय मे कोई  पशुओं को नही रखना चाहता है। जब कि प्राचीन समय मे लोग पशुओं को यह सोंचकर रखते है कि उनकी सेवा से पुण्य मिलेगा और घर में दूध-दही तथा और कंडे-खाद आदि प्राप्ति होगी।

 पर मानवता अब धीरे-धीरे नष्ट होते जा रही है। ऐसा सोंच अब कही भी दिखाई नही देता है। छत्तीसगढ़ के महान संत “गुरु घासी दास” जी ने उपदेश में कहा था कि मूक पशुओं के ऊपर हिंसा करना पाप है। अर्थात उनको मारना पीटना शारारिक कष्ट देना ही हिंसा नही है अपितु उनके चारागाह भूमि को कब्जा कर लेना तथा गोचर भूमि से दरवाजे पर बांध देना भी एक तरह  हिंसा है । पंजाब के महान संत “गुरु नानक देव” जी भी पशुओं से असीम प्रेम करते थे,तथा भगवान कृष्ण ने अपना बचपन ग्वाल बनकर ही पशुओं साथ जीवन व्यतीत किये है। इन सबको देख-सुनकर भी मनुज को अपनी गलती का एहसास नही होता,ऐसे लोगों को समझाना अपने पाँव में कुल्हाड़ी मारने के बराबर है। 

         फिर मुझे अपने गाँव की स्थिति याद आई अभी तो हमारे गाँव मे चारागाह के लिये भूमि है पर जिस प्रकार से सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर रहे है उनको देखकर लगता है कि वह दिन दूर नही जो मेरे मित्र के गाँव में हुआ है वही घटना मेरे गाँव मे भी दोहराया जाएगा,मवेशी सड़क में आ जाएंगे,मूक पशु अपनी पीड़ा किसे सुनायेंगे?वही चिंता मुझे खाये जा रहा है सोंच-सोंचकर विचलित हो रहा हूँ कि इस गौचर भूमि को कैसे बचाया जाय?अतिक्रमण करने वालो को कैसे रोका जाय?और इन पीड़ित मवेशियों को कैसे न्याय दिलाया जाय? क्या कोई नही है जो इनकी क्षुब्धता को समझकर आवाज उठावें?उनके हक के लिये लड़े? पर मैं किन लोगो से कह रहा हूँ यहाँ तो सभी निर्जीव है सभी स्वार्थी है,केवल अपने सुख भोग के साधन को देखते है इसलिए मेरी यह अंधी आशा पहेली बनी हुई है। जिसको सुलझाने की कल्पना मेरे चित्त से परे है। 

          फिर भी मेरा मन कहता कि मनुष्य में मानवता भले ही नही है,पर शासन-प्रशासन इस पर अवश्य ध्यान देंगे,और निरीह पशुओं को न्याय दिलाने में मेरी सहायता करेंगे ऐसा मुझे पूर्ण विश्वास है। 

✍🏻चन्द्रकान्त खुंटे “क्रांति”
जाँजगीर-चांपा (छत्तीसगढ़)

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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