पुस्तक समीक्षासाहित्य

अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है मुस्कान:डॉ.अनिल शर्मा ‘अनिल’

पुस्तक समीक्षा: “मुस्कान” काव्य संकलन

लेखक: सुषमा श्रीवास्तव

समीक्षक: डॉ.अनिल शर्मा ‘अनिल’


सुषमा श्रीवास्तव की कविताएं जिंदगी के विविध रंगों से सजी ऐसी रचनाएं हैं, जिनमें हमें स्वयं की अनुभूति की अभिव्यक्ति का अहसास होता है। लगता है कि अरे,यह तो मेरे ही मन की बात है।
हम बात कर रहे हैं -: काव्य संकलन “मुस्कान” की,जो हमरुह प्रकाशन से प्रकाशित है और जिसकी रचनाकार हैं,हिंदी संस्कृत से एम.ए.बी.एड.सेवानिवृत्त शिक्षिका सुषमा श्रीवास्तव। मुस्कान एक सौ एक पृष्ठीय काव्य संकलन है, जिसमें इनकी साठ रचनाएं शामिल है।
यह सभी रचनाएं जीवन के विविध अनुभवों
की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है।इसे इन रचनाओं के शीर्षक से ही भली भांति समझा जा सकता है।
मुस्कान,जीवनचर की उड़ान, प्रकृति संदेश,
मां का आंचल,पुराना मकान, जिंदगी का
सफर, सांवरे संग प्रीत,सबला नारी,आखिरी मुलाकात, रविवार की सुबह,लेखक का
सपना, कालेज के दिन, हिंद के जवान,विदेश यात्रा,कान्हा संग प्रीति, परियों की दुनिया,मकर संक्रांति,व्यथा औरत की,जुगनू,समय की बात,सर्दी का मौसम,वो मुझे छोड़कर जा चुकी थी,प्रिय बसंत, किस्से नये पुराने, हमारी बेटियां, दादा दादी, गणतंत्र दिवस,जादूगर, दूल्हा दुल्हन, खिलखिलाती हंसी,जीवन झूला, लुकाछिपी,दे रहे अंतिम विदा,बचपन का घर,अपना गांव,भाग्य का खेल, समझौता, सतरंगी आसमान,वैधव्य का श्रृंगार, वसंतोत्सव पर सरस्वती स्तुति,बसंत ऋतु, महाशिवरात्रि,
जिंदगी की दौड़,हार में भी जीत है,किताब और जिंदगी,बीता कल, कविता,गंगा स्तुति, पितृत्व गान,मेरा अस्तित्व,अग्निवीर,स्वार्थीमन, रिश्तों की डोर,मन चितेरी, बारिश,आत्मा की पुकार,रेत का घर, बरसात का पर्व,चांद और चांदनी, नदिया किनारे,अधूरा ख्वाब।
इन कविताओं की भाषा सहज,सरल और  बोधगम्य है। रचनाकार ने अनावश्यक क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग नहीं किया है। इसमें आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग है, जिससे विभिन्न भाषाओं के प्रचलित शब्द स्वत: ही
आ गये हैं।
अधिकांश रचनाएं तुकांत है, लेकिन छंदमुक्त रचनाएं भी इसमें दी गयी है। अपने आसपास के विषयों को  सुषमा जी ने सहज ही अपनी कविता का कथ्य विषय बनाया है।
सेवानिवृत्त होने के बाद आध्यात्मिकता की
ओर झुकाव होना स्वाभाविक है। नदिया किनारे
कविता की यह कुछ पंक्तियां विशेष रूप से उल्लेखनीय है-
नदिया किनारे एक कुटिया बनाऊँ
कुटिया बनाऊँ और झारूं बुहारुं।
  ××××××××××××××××××
रैन दिवस बस सुमिरन पाऊँ
अंतकाल उसमें ही समाऊँ
बोलो हरिहर बिनु मैं
कहाँ सुख पाऊँ।
कुल मिलाकर मुस्कान में शामिल रचनाएँ
आंनद की अनुभूति करातीं हैं। इस संकलन के लिए रचनाकार को हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाई।
*समीक्षक- डॉ.अनिल शर्मा ‘अनिल’
धामपुर उत्तर प्रदेश।

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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