कवितासाहित्य

अपना शहर

राजीव कुमार झा

कोई
जाना पहचाना
रास्ता आज
याद आता
अपना पुराना मकान
अब कहां कोई
पहचान पाता
वह बिक गया
उसका हुलिया भी
बदल गया
शहर का माहौल
कैसा हो गया
भीड़भाड़ बढ़ गई
मां अकेली
घर में रह गयी
शहर में जिंदगी का
फलसफा
रोज बदलता गया
सीढ़ियों से आदमी
उतरता रहा
अब लिस्ट पर चढ़कर
कहां जा रहा
आकाश चुप्पी से
घिरा है
हर आदमी अपने
काम में लगा है
बाजार करीने से
सजा है
घूमने फिरने में
अब सिर्फ मजा है
औपचारिक रिश्तों के
सामने
सारे सगे भाई
झूठे हो गये
सब अकेले
रात में खा पीकर
सो गये
सुबह की बाकी बातें
बच गयी हैं
बहुत निकट से
जिंदगी को
सब जानते हैं
भगवान को
अब अपना मानते हैं
नदी के किनारे
गांव में बगीचे के
पिछवाड़े
शहर के लोग
गांव जाकर
बंटवारा
करने वाले
प्लेटफार्म पर
उतरकर
उच्च श्रेणी के
प्रतिक्षालय में
बैठने चले जाते
कल की फ्लाइट का
समय सुबह है
आफिस यहां से
काफी दूर है
आबादी में बढ़ोतरी के
साथ
मेट्रो में जिंदगी की
रफ़्तार
तेज हो गई
इसके बिना
शहर में
कोई जान नहीं है
शहर
अलंकार है
जीवन रस है
यह आत्मा है
सबमें इसका
वास है
अरी सुंदरी !
रात में शहर का
सपना
यहां अकेले
रहना
अजीब है
गांव से आकर
आदमी
यहां गरीब है
वह खुद को
यहां भूलने
लगता,
रोज काम करता
मर्द बना रहता
किसी को
कुछ भी नहीं कहता
अकेले
वह निकल जाता
समय की सड़क पर
जिंदगी का घोड़ा
सरपट दौड़ता रहता
शहर के बाहर
जो भी रहता
इसके बारे में
कोई कुछ भी
अब नहीं कहता
सूनकर
यहां ऐसी बातें
हर आदमी हंसता
इसकी परवाह
सबको है!
अपनी जान बचाना
दोपहर में
निकल जाना
काफी कठिन है
यहां खुद को पाना
मुसीबत में
किसी को बचाना,
उसके घर जाना
सबके बारे में
बताना !


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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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