कवितासाहित्य

आँँसू

__प्रेम बजाज

वो इस कदर दिल में बस गया था, कि दिल छोड़ मुझे उसी का हो गया था,
छोड़ कर जब चला गया वो,ज़माने ने देखा कि आंसुओं में बह गया था।

मगर हकीकत तो कुछ और है यारो वो थोड़ा सा कहीं रह गया था,
आंसूओं के संग तो मेरा अपना- आपा बह गया था।

की बहुत कोशिश कि आंसुओं को बहा कर के सैलाब ला दूं,
बस एक ही बार में रो लूं जी भर कर, और इन आंसुओं में उसे बहा दूं।

रोती रही ज़ार-ओ- ज़ार ता-उम्र मैं, बैठी रही चौखट पर ता- उम्र उसके इंतजार में,
ना बहा सकी उसे इक भी आंसू में लाख की कोशिश उसे दिल से निकाल दूं।

हर दिन तकी राह उसकी, हर शब काटी उसके इंतजार में,
कोई तो पूछे हाल मेरा किस तरह कटी मेरी शब हिज़्र-ओ-विसाल में।

तन्हाई सी जब उन्हें पसंद है, उन्हीं की पसंद को अपनाना होगा,
सी कर लबों को,रहकर अंधेरों में आंसू बहाना होगा,
रहकर दूर उनकी याद में ही वक्त बिताना होगा।

जाते-जाते बता जाते रूख़सत की वजह, मान जाते
हम गुनाह अपना, यूं बेवजह हम आंसू ना बहाते।

प्रेम बजाज ©®
जगाधरी ( यमुनानगर)

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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