साहित्य

आओ न कृष्ण


आज फिर वही,
भादों अष्टमी की रात है।
भावनाएं उमंगित हैं,
प्रबल झंझावात है।
भव पार कराओ न कृष्ण।
आओ न कृष्ण।

हम मोह में पडे़,
अपार संशयों से घिरे,
भावी अनहोनी से डरे,
दुविधा मुक्त कराओ न कृष्ण।
आओ न कृष्ण।

हमें कर्म और योग का,
प्रेम और वियोग का,
त्यागपूर्ण भोग का,
मर्म समझाओ न कृष्ण।
आओ न कृष्ण।

आज स्थिति विकट है।
शतरंजी चालें चलता शकुनि कपट है।
निर्मम है कालचक्र की गति,
नियमन कराओ न कृष्ण।
आओ न कृष्ण।

आज कंस का क्रूर प्रहार है।
कालिया की विषैली फुँकार है।
हर ओर संताप चीत्कार है।
नेह बाँसुरी बजाओ न कृष्ण।
आओ न कृष्ण।

तुम ही तो थे चक्रधर,
जिन्होंने अधर्म को संहारा।
इंद्रगर्व भंजन हित गोवर्धन धारा।
नारी अस्मिता को दिया सहारा।
फिर लाज बचाओ न कृष्ण।
आओ न कृष्ण।

तुमने कहा था न,
आओगे हर युग में,
साधुजन परित्राण के लिए
धर्म उत्थान के लिए,
मानवता को अभय दो
आशीष भरा वरद हस्त फैलाओ न कृष्ण।
आओ न कृष्ण।

अध्याय महाभारत का,
पुनः खुलने मत दो।
अंध मोह को बढ़ने मत दो।
विवेक को वाणी दो।
अनय का दमन करो।
गीता संदेश देकर ,नाद पाँचजन्य का गुँजाओ न कृष्ण।
आओ न कृष्ण।

वीणा गुप्त
नई दिल्ली

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