साहित्य

आजकल के सियासतदां

जितेन्द्र ‘कबीर’

मारना जो हो कभी ‘श्वान’
तो दे कर उसे
पागल करार
खूब कर दो बदनाम
ताकि जब मारो उसे
तो करे ना दुनिया
कोई सवाल,
प्रयोग खूब करते हैं
इस युक्ति का इंसानों पर
आजकल के सियासतदां।

किसी भी घटना को
सांप्रदायिक रंग देने के लिए
तैयार बैठे रहते हैं
सोशल मीडिया के उनके
पहलवान,
दलगत व निजी स्वार्थ के आगे
ऐसे लोग नहीं देते
किसी की इज्जत और
प्राणों को भी अधिमान,
राजनीति में सही-गलत
कोई भी हथकंडा अपनाकर
सफल होने वालों का दौर चला है,
इंसान नहीं हों जैसे
कोई शिकारी जानवर ही बन गये हैं
आजकल के सियासतदां।

                      
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