साहित्य

आज का चिंतन

मानसी मित्तल

विजयदशमी की प्रथा वर्षो से चली आ रही है। जिस वजह से हम विजयदशमी मनाते हैं आज वो एक चिंतन का विषय बन चुका है।क्योंकि आज न जाने कितने ही(असंख्य)रावणों ने जन्म ले लिया है। आज तो हर गली, मोहल्ले, नुक्कड़, चौराहे, आदि पर रावण खड़े मिलेंगे।

राम के युग का रावण ज्ञानी और विद्वान था। लेकिन अपनी बहन का अपमान उससे सहा नही गया और द्वेष की आग में जल उठा। रावण में एक ही बुराई थी कि वो बहुत अभिमानी और अहंकारी था।लेकिन इस बुराई के होते हुए भी एक मर्यादा रखी।सीता माँ का हरण करके भी उसने उनके सतीत्व की लाज रखी।

लेकिन आज के युग के रावण विभिन्न रूप धारण कर बेखौफ घूम रहे हैं। ना जाने कितनी ही माँ, बहन बेटी, की इज्जत को तारतार करते आ रहे हैं। जैसे अपनी सभ्यता और संस्कारों से तो मुँह ही मोड़ लिया है। कुछ भी गलत काम करने में जरा सा भी नही हिचकिचाते हैं। मानो अपने अस्तित्व का तो दम ही घोट दिया हो।
ऐसा लगता है जो रावण वर्षों पहले श्री राम के हाथों मारा गया था उसे ही अपने दिल मे बैठा लिया है।
क्या कोई राम बन पाएगा??
मुझे नही लगता कोई बन पाएगा!!
क्योंकि उसका एक ही कारण है ??
रावण तो हर व्यक्ति के जहन में रच बस चुका है जो कि असंख्य रावण का रुप रख चुके हैं। लेकिन राम कोई न बन सका है और है भी तो हजारों में सिर्फ एक। अब ऐसे में तो अकेले राम भी न लड़ पाएंगे!!
हम हर साल कागज का पुतला बनाकर जलाते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाते हैं। क्या यह सही मायने में विजय का प्रतीक है??
नही न!!!
यदि सही मायने में दशहरा यानी विजय पर्व मनाना है तो पहले अपने भीतर बैठे रावण को जलाना होगा। जब तक जियें सच्चाई के साथ जियें। और इसे सार्थक करने का प्रयास करें।

स्वरचित✍️
मानसी मित्तल
उत्तर प्रदेश
चित्र गूगल

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