साहित्य

आज के चीखते दोहे

पंडित राकेश मालवीय मुस्कान
तपती धरती चीखती, व्याकुल मनवा रोय।
आपाधापी जगत में, किसने दी है बोय।।1।।
पेड़ टूट निर्बल हुए, श्रद्धा गई बिलाय।
मानुष स्वारथ में फँसा, अपन अपन ही खाय।।2।।
पढ़ लिखकर भी अपढ़ हैं, नाशहिं कहें विकास।
इनसे कैसी चाहते, कैसी इनसे आश।।3।।
ईश खड़ा उत देखता, कैसी मानव जाति।
कैसी रचना कर गया, कैसी बनती पाँति।।4।।
रूठा गगन न बरसता, मेघ ठहर नहि पाय।
पर्यावरण विलुप्त है, रहि रहि मन पछिताय।।5।।
कागज में पौधे उगे, टीवी पर हरियाय।
सड़क किनारे आग है, राही देत जलाय।।6।।
आम नहीं जामुन नहीं, पीपल दिए कटाय।
बरगद वर से दूर है, गद कैसे कट जाय।।7।।
मन राकेश बिसूरते, कहते हैं फरियाद।
हरित तृणों बिन क्या लिखूँ, कैसी डालूँ खाद।।8।।
हे राधे! किस वन फिरूँ, नहि कदंब की डार।
नदी सूख पथरा गई, चल मन तू शिव द्वार।।9।।
पंडित राकेश मालवीय मुस्कान
प्रयागराज-16

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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