साहित्य

आतंक

रीमा सिन्हा

अंतहीन अनल की लौ में मानव धधक रहा है क्यों?
शोणित का पिपासित रक्तिम चमन हो गया हो ज्यों।
गांडीव की टंकार पर बारूद बना क्यों भारी?
कृष्ण रथ को छोड़ कर रहा असुर स्यंदन की सवारी।

हैवानियत के उच्च शिखर पर जा पहुँची मानवता,
कर कृपाण,भावशून्य हृदय,जाने कैसी ये पाश्विकता?
समस्त विश्व में बढ़ रहा है आतंक का घिनौना रूप,
दिव की प्रज्जवलित शिखा सम वैषम्य का प्रारूप।

जल रहा सब धू धू कर,व्योम का छिन गया सुधाकर,
दुःखी मानव,दुःखी मानवता,भय व्याप्त हर तरफ।
निहत्थे,निरीह जन की आँखों में मृत्यु का है भय,
पिशाच बने मानवों की हो रही है आज जय।

शीतल रागिनी भी रणित है आज विषम पहर में,
विकट हिंसा का उत्सव हर देश और शहर में।
रक्तरंजित हो रही है आज शुभ्र पट संसृति की,
शर्मशार हुई मानवता,तार-तार संस्कृति की।

फेंक पुष्प शर उठाना होगा,सिंहपौर तक स्वयं जाना होगा,
भटक रही सभ्यता,दानव करों से वापस लाना होगा।
शांति नियति के वचन से अनभिज्ञ वे क्रूर हैं,
विषधारी सर्प हैं वे,दया-धर्म और क्षमा से दूर हैं।

शांति,प्रेम भाव से अब जीत न पाओगे जंग,
सुधा कैसे बरसेगी जब कुंडली मार बैठा हो भुजंग?
रणभेरी की हुंकार से रिपु सेना भयभीत होती है,
जो बैठोगे मूक तो,असि-धार से गर्दन कटती है।
रीमा सिन्हा
लखनऊ-उत्तर प्रदेश

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