कवितासाहित्य

आत्म चिंतन

__अलका गुप्ता ‘प्रियदर्शिनी’


जब किया आत्म चिंतन मैंने खुद को पाया अज्ञानी,
जो भी मेरे सम्मुख आया माना उसको गुरु ज्ञानी।

जो भाव दिखा उसके मन का शब्दों को दे दी घानी,
जो सीख सकी वह सीख लिया मेरा रंग जैसे है पानी।

कहीं मिली ज्ञान की गंग से में भरपेट पिया मैंने पानी,
हुई तृप्त ज्ञान की गंग में में मेरा रंग जैसे है पानी।

जल का स्वभाव समृद्ध, सरल सब में मिल रहने की ठानी,
कभी नदिया सी बहती कल कल कभी झरने सा बहता पानी।

निर्भीक सदा सच साथ रहूं ईमान संग तोल मोल बोलूं वाणी,
निज कर्म करूं सघन कर्मठता से कर्म पथ पर मेरा नहीं दूजा सानी।

कोई काम नहीं ऐसा मेरे सम्मुख जिसे देख बनूं मैं नादानी,
मन में संकल्प हो करने का फिर सतत प्रयास करने की ठानी।

मन में है विश्वास बड़ा जब दुख दुविधा सम्मुख है आनी,
पर्वत सा कर विचार बड़ा सुदृढ़ जिसने कभी हार नहीं मानी।

जग में असंभव नहीं कुछ भी जिसे छोड़े ‘अलका’ सा प्राणी, सम्मुख आया वह कर डाला रही सदा कर्म पथ दीवानी।

जब किया आत्म चिंतन मैंने खुद को पाया अज्ञानी,
जो भी मेरे सम्मुख आया माना उसको गुरु ज्ञानी।

अलका गुप्ता ‘प्रियदर्शिनी’
लखनऊ उत्तर प्रदेश।

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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