साहित्य

आपबीती

वीणा गुप्त

एक था बूढ़ा ,
एक थी बुढ़िया ।
पति पत्नी थे,
इक दूजे की दुनिया।
कहते से सब ये,
पर ये था नहीं।
दोनों की ही
अलग अलग थी दुनिया।

साथ रहते रहते
मिलने लगी शथीं शक्लें।
साथ पचास बरस का,
मिला न पाया अक्लें।
जो बुढ़िया को पसंद था,
बूढ़े को नापसंद।
जो बूढ़ा चाहता था,
बूढ़ी नहीं रज़ामंद ।

चल रही थी फिर भी
ज़िंदगी की गाड़ी।
दोनों थे सयाने,
दोनों कुछ- कुछ अनाड़ी
पल बढ़कर बच्चे,
अपनी दुनिया में रमे।
पहले समय कम था,
अब बैठे ठाली अनमने

देखा करते मुँह इक -दूजे का,
बातें सब चुक गईं।
कोई बोलेगा, मन खोलेगा, ऐसा हुआ नहीं।
कभी कोई बोला तो
बात पूरी न हुई।
सुनाने की जल्दी थी,
सुनना आता नहीं।

दिन भर होती थी
भौं-भौं,खौं खौं
बूढ़ी एक कहती,
बूढ़ा सौ सुनाता
कोसता, बड़बड़ाता, गुस्साता,गरियाता
बूढ़ी चुप सुनती,
मन ही मन झुरती।

कभी अकेले में बुड़बुडाती,चिल्लाती।
फिर रसोई में जाकर ,
खाना पकाती।
बूढ़ा नमक कम,हल्दी ज्यादा, का राग गाता।
बूढ़ी का इससे
कुछ नहीं था आता -जाता।

कभी भूले -भटके,
रिश्ते नाते, मिलने आते।
हाल- चाल पूछे जाने पर, दोनों ही मुस्कराते।
सुखी जीवन का
बेमिसाल अभिनय करते
लोगों को सुखी जीवन का गुर बताते।

कभी बूढा बीमार होता,
तो बुढ़िया धबराती
बूढ़ी हुई ढीली तो बूढ़े की जान पर बन आती।
सेवा जतन का बहता सोता, कोई कमी न होती
पर चार दिन की चाँदनी,
फिर वही रात होती।

बड़ा ही अनोखा था,
बूढ़े बुढ़िया का नाता।
तकरार और प्यार की हर
हद को झुठलाता।
ऐसे ही चल रही थी,
चलेगी,उनकी दुनिया।
आपबीती यह,
पर घर-घर में हैं
यही बूढ़े-बुढ़िया ।

वीणागुप्त
नई दिल्ली

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