साहित्य

आप से ही मिलाती नहीं

नींद आती नहीं, रात भाती नहीं,
आपकी बात भी अब सुहाती नहीं।

चैन गायब हुआ है दिन रात का,
क्या करूं मैं यही जान पाती नहीं।

नाम लेकर पुकारा किये आपको,
बस यही बात मैं भूल पाती नहीं।

चांदनी रात थी,आपकी बात थी,
आप आते अगर ,जान जाती नहीं।

आप नाराज़ हैं, मैं नहीं जानती,
जानती मैं अगर तो बुलाती नहीं।

रूठने की अदा आपसे ही मिली,
मान जाते अगर मैं सुनाती नहीं।

आप आए अगर अब ठहर जाइए,
आपसे कह रही मैं मनाती नहीं।

प्यार करती रही इसलिए आपको,
आप से ही कभी भी मिलाती नहीं।

अनुपम चतुर्वेदी, सन्त कबीर नगर, उ०प्र०
रचना मौलिक, सर्वाधिकार सुरक्षित
मोबाइल नं ०-9936167676

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