कवितासाहित्य

आवारा

ना मै पंछी आवारा
दाने की तलाश में फिरता हूं

तोड़ ना दे कोई नीड कही
हर पल इस डर में रहता हूं

ना मै पंछी आवारा
दाने की तलाश में फिरता हूं

रखा होगा तुमने दाना छत पर
यह सोच में तुम्हारे घर को आ जाता हूं

ना मैं पंछी आवारा
दाने की तलाश में फिरता हूं

ना करता मैं घनघोर अंधेरा
जल्दी से घर को जाता हूं

ना समझो तुम मुझको आवारा
दाने की तलाश में फिरता हूं

varsha bhati

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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