साहित्य

इंतज़ार करती है…

किरण झा


ऐ चांद,
क्यूं इतनी दूर है तू
लगता है
मेरी ही तरह बहोत मजबूर हैं तू
कभी पूरा तो कभी आधा अधूरा सा
कभी गायब तो कभी जरा सा
बादलों के बीच
अठखेलियां करता हुआ
कितना प्यारा नजर आता है
मुझे क्या
तू तो पूरे संसार के मन को भाता है
हर विरहण देखा करती है
अपने प्रियतम को तुझमें
ना जाने कितनों को समाये रखा है खुद में
अश्कों को पिरोकर नैनों में
जब भींगी पलकों से तुम्हें देखती हूं
तू भी शबनम बरसा दिया करता है
कहां कुछ समझ पाती हूं
शायद
तुम पहचान नहीं पाये हो मुझे
जान नहीं सके हो मुझे
कभी चहल-कदमी करते हुए
देखा है उस लाल सितारे को
जो,
चुपचाप,
टिमटिमाता है,फलक के कोने में
और
आफताब के आते ही गुम हो जाता है
हां
सही है,वो मैं ही हूं
खुद में जलती
खुद में पिघलती
इस बार आओ फलक पर
तो
मुझसे मिल लेना
दूर ही से सही, मुझे अपने में समेट लेना
“किरण”
जकड़ी हुई है बेड़ियों से
लाचार सी रहती है
पर सुनो ना
हर वक्त तुम्हारा इंतज़ार करती है

किरण झा, रांची झारखंड

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