साहित्य

इंसानियत को दोस्तों बदनाम ना करो

रेखा रानी

झुक जाएं आँखें शर्म से वह काम न करो।
इंसानियत को दोस्तों बदनाम न करो।
नज़रें झुकें तो केवल सम्मान में झुकें।
जब भी कदम बढ़ें तो सन्मार्ग में बढ़ें।
गर हाथ दो जुड़ें तो सिर्फ़ शान में जुड़ें।
मुंह से जो शब्द निकलें सदा तौलकर कहें।
वाणी से अपनी दोस्तों प्रहार न करो।
इंसानियत को दोस्तों बदनाम न करो।
कुछ लोग राजनीति की भट्टी जला रहे।
आपस में फूट डालकर रोटी पका रहे।
जयचंद देखो आज़ भी जूते उठा रहे।
वो चापलूस देखो मक्खन लगा रहे।
अब और अपनी कौम को बदनाम न करो।
इंसानियत को दोस्तों बदनाम न करो।
बनकर किसी के देखो जन्नत न हो तो कहना।
देकर किसी को देखो दुगुना न हो तो कहना।
ख़ुद हारकर तो देखो विजेता न हो तो कहना।
गम ख़ुद चुराकर देखो जग महके न तो कहना।
ख़ुद पे लजाएं आँखें वो काम न करो।
निर्माता सिर्फ़ एक है जिसने रची यह बस्ती।
सागर बहुत ही गहरा जिसमें है तेरी कश्ती।
चल नाव भी चला पर करता भी चल तू मस्ती।
रो जाएं जो यूं ही बस खुशियां नहीं हैं सस्ती।
रेखा लगाओ मरहम तुम घाव न करो।
इंसानियत को दोस्तों बदनाम न करो।
झुक जाएं आँखें शर्म से वह काम न करो।

रेखा रानी
विजयनगर गजरौला
जनपद अमरोहा, उत्तर प्रदेश।

100% LikesVS
0% Dislikes

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button
error: Content is protected !!