साहित्य

इनकार

संजय कुमार


चलो तुम मेरे साथ,
उस झील के पार।
जहॉं चाँद अपनी,
अलौकिक प्रभा के साथ।
सृष्टि की नीरवता में,
उस झील की शांत,
धवल जलधारा में
अपनी रश्मियों के साथ,
इतरा रहा है।
लेकिन सुना है,
वहाँ जाना
असंभव है।
ठीक वैसे ही,
जैसे रात की तन्हाई में,
तुम्हारा मुझसे मिलने आना।।
है न,
ध्रुव सत्य।
ठीक वैसे जैसे तुम्हारा,
प्रेम का इजहार करते- करते
दुनिया के सामने
मुझे पहचाने से
इनकार कर देना।

स्वरचित मौलिक रचना


संजय कुमार (अध्यापक )

कहलगाँव,भागलपुर ( बिहार )

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