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ईश कृपा

__प्रीति चौधरी”मनोरमा”
जनपद बुलंदशहर
उत्तरप्रदेश

देख जगत की यह सुंदरता,
हतप्रभ सी हूँ रह जाती।
ईश कृपा की चाह लिए मैं,
धूप घनी हूँ सह जाती।

पेड़ कहीं हैं वसुधा बंजर,
कितनी सुंदर है धरती।
ऊँचे पर्वत हरित समंदर
मन को विस्मय से भरती।
कागज पर कितने ही अनुपम,
संवादों को कह जाती।
ईश कृपा की चाह लिए मैं,
धूप घनी हूँ सह जाती।।

यह जग कितना है पावन,
देते ईश्वर ही साँसें
ईश दया का बरसे सावन,
चुभतीं जब मन में फाँसें।
संग सदा ही रहते गिरिधर,
पीर इमारत ढह जाती।
ईश कृपा की चाह लिए मैं,
पीर घनी हूँ सह जाती।।

होंगी साथी जगमग रातें,
आस सदा मन में रख ले।
कर में रखकर श्रम की चाबी,
जीत सुधा तू भी चख ले।
धार समय की कब है मुड़ती,
रेत बनी फिर वह जाती।
ईश कृपा की चाह लिए मैं,
पीर घनी हूँ सह जाती।।

प्रीति चौधरी”मनोरमा”
जनपद बुलंदशहर
उत्तरप्रदेश

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कुमार संदीप

अध्यापक सह लेखक । निवास स्थान- सिमरा(मुजफ्फरपुर) बिहार । विभिन्न साहित्यक पत्र पत्रिकाओं में निरंतर रचना प्रकाशन । कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित । वर्तमान में ग्रामीण परिवेश में अध्यापन कार्य सहित दि ग्राम टुडे मासिक व साप्ताहिक ई पत्रिका के अलंकरण का कार्य।

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