साहित्य

उर्मिला-लक्ष्मण मिलन बेला


सतेन्द्र शर्मा ‘तरंग’


कानन जीवन जब अंत हुआ।
सुगम अवधपुर का पंत हुआ।।
रघुवीर लखन तब घर आये।
भाग उर्मिला के जग पाये।।

उर्मिल-लखन मिलन यह गाथा।
त्याग कहे दोनों का नाता।।
जीवन के ये कैसे लेखे।
वर्षों पीछे स्वामी देखे।।

लखन देख उर्मिल हरषाई।
मन ही मन पल भर मुस्काई।।
चौदह वर्ष याद जब आये।
दृग में टूटे स्वप्न समाये।।

लहर मिलन की छाई तन में।
प्रश्न यही आया तब मन में।।
कैसे बीते दिन अरु रैना।
टप-टप नीर बहाते नैना।।

प्रिय को देखा जब व्याकुल सा।
उर हुआ लखन का आकुल सा।।
उसका त्याग समझ में आया।
उर्मिल को तब गले लगाया।।

याद किया उर्मिल का भूमा।
आलिंगन कर माथा चूमा।।
प्राणप्रिया वन्दन है तुझको।
तप ने मोह लिया है मुझको।।

यह रचना मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित है

सतेन्द्र शर्मा ‘तरंग’
देहरादून।
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