कवितासाहित्य

एक औरत के आँसू

ब्रिजकशोरी त्रिपाठी


अश्रु तुम रुक जाओ,
ठहर जाओ।
क्यों बहते रहते हो अभी,
तो जमाने के बहुत ठोकर
बाकी है।
क्यों निरंतर बहते हो अभी
ठहर जाओ।
एक जन्म माँ बाप दिये थे
लडकी का।
दूसरा जन्म समाज ने दिया
बहूँ बनाकर।
माँ को छोड़ कर पराये घर आई बहुत अश्रु बहाई।
लेकिन मैके मे बन गई पराई।
जहाँ आई वहाँ बार बार पराई कहाई।
बार बार अश्रु लुढ़के किसी ने
कीमत नहीं आकी।
रूक जा अभी तो पूरी जीन्दगी है बाकी।
जीसके साथ गाँठ बधा उनको सर्बस्व अर्पण किया।
क्या हुआ फिर बहने को
अश्रु तैयार दिल कसक गया
यहाँ कौन अपना है माँ की
याद आई
और आँखोंने सहस्त्र धारा बहाई।
स्वरचित
बृजकिशोरी त्रिपाठी
गोरखपूर यू.पी

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Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

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