गीतसाहित्य

एक गीत कुछ ऐसे हुआ

__(प्रवेंद्र पण्डित)
अलवर (राजस्थान)

हारूंगा तो खुद से ही मैं।
और किसी से कभी नहीं।।
करो न जल्दी खुश हो लेना।
जीभर लेकिन अभी नहीं।।

अभी कलम में शक्ति शेष है।
माँ शारद की भक्ति शेष है।
जो कुछ बाकी रहा आज तक।
सच कहता हूं वह विशेष है।
हिय का स्पंदन भी रुकता ।
सोच समझ कर तभी नहीं।

झूठा सुख जब तक जिंदा है।
पग पग पर उसकी निंदा है।
दुख देकर बेरहम जहां में।
कौन हृदय से शर्मिंदा है।
भूल रही इसमें मेरी ही।
जान सका क्यों जभी नहीं।

इस रण में बहुतेरे घाती।
जिन्हे प्रीत बिल्कुल न सुहाती।
तेल चुराते हैं दीपक का।
सिसक सिसक जलती है बाती।
यह सब पर आरोप नहीं है।
कुछ दोषी हैं सभी नहीं।

(प्रवेंद्र पण्डित)
अलवर (राजस्थान)

50% LikesVS
50% Dislikes

Shiveshwaar Pandey

शिवेश्वर दत्त पाण्डेय | संस्थापक: दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह | 33 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय | समसामयिक व साहित्यिक विषयों में विशेज्ञता | प्रदेश एवं देश की विभिन्न सामाजिक, साहित्यिक एवं मीडिया संस्थाओं की ओर से गणेश शंकर विद्यार्थी, पत्रकारिता मार्तण्ड, साहित्य सारंग सम्मान, एवं अन्य 200+ विभिन्न संगठनों द्वारा सम्मानित |

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button
error: Content is protected !!