साहित्य

एक दीवाली यह भी

वीणा गुप्त

दीपावली का हुआ समापन,
हुआ प्रभु का अभिनंदन वंदन।
स्थापित राम राज्य अवध में।
पर अब भी कातर हृदय हमारा है।

एक बार अंधेरे ने फिर से
उजाले को ललकारा है।
टूट गईं सारी मर्यादाएं,
बहरूप दशानन ने धारा है।
मत जाओ राम, तुम मृग के पीछे,
खड़ा अधर्म ,धर्म ओट ले।
छलिया मारीच ने कुटिल,
स्वर्णाभ- जाल पसारा है।
एक बार अंधेरे ने फिर से
उजाले को ललकारा है।

सीता मन में विश्वास धार लो।
लक्ष्मण की अब बात मान लो।
शील विवेक के प्रतिरूप हैं ये,
अनिष्ट न कुछ भी होने देंगे,
अलंध्य लक्ष्मण -रेख खींचेंगे।
राम ही उनका सहारा हैं।
एक बार अंधेरे ने फिर से,
उजाले को ललकारा है।

बात न सीता ने पर मानी,
आकुल मन ने की नादानी।
ऐसे व्यंग्य -बाण बरसाए,
लखन विवश हो वन को धाए
हुआ दुष्टता का मन चीता,
रेख लांघ कर आईं सीता।
रावण के जाल में पड़ गईं,
आर्त ,त्रस्त ,भय कातर हो ,
उन्होंने जटायु को पुकारा है।
एक बार अंधेरे ने फिर से
उजाले को ललकारा है।

आज जटायु नहीं मरेंगे,
सीता का उद्धार करेंगे।
पांखों की ताकत तौलेंगे,
रावण से वे लोहा लेंगे,
उसकी एक न चलने देंगे,
नारी के सम्मान के हेतु
उसकी बीस भुजा काटेंगे,
प्रण सीता की रक्षा का ,
मन में उन्होंने धारा है।
एक बार अंधेरे ने फिर से ,
उजाले को ललकारा है।

मारीच वध कर राम आएंँगे,
व्याकुल लखन साथ आएंगे,
पर्णकुटीर में बाट जोहते,
तात जटायु धीरज खोते,
सीता बैठीं सिर को झुकाए।
चिंतित भ्रात कुटिया में आए।
जान प्रसंग,राम हैं विस्मित,
गदगद हो कर,कृतज्ञ स्वर में,
लखन ने इष्ट को पुकारा है।
आज अंधेरे ने फिर से
उजाले को ललकारा है।

आज मनेगी खूब दीवाली,
मन में छाएगी हरियाली। खूब सजेंगी दीपावलियाँ,
कपट पोल की खुली है गहरी,
शौर्य,वीरता की ध्वजा फहरी।
मर्यादा ने सीमा पहचानी,
अहंकार भू -लुंठित होता,
आज धर्म की जीत हुई है।
आज अधर्म फिर हारा है।
अंधेरे की हर एक चुनौती
उजियारे का जयकारा है।
आज मनेगी नई दिवाली।
मुखरित उत्सव धारा है ।

वीणा गुप्त
नई दिल्ली।

स्वरचित, मौलिक और अप्रकाशित रचना

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