साहित्य

औरत की कुर्बानी

औरत…. नाम पढकर ही लोगों के दिमाग में एक धारणा बन जाती हैं ।
साधारण, अबला, बेबस, बेसहारा या यूँ कहे कि कुछ भी नहीं ।
एक लड़की औरत तब बनती हैं जब वो किसी गैर मर्द के लिए अपना घर – परिवार छोड़ कर आती हैं और उस गैर मर्द को अपना पति रूप स्वीकार कर ईश्वर की छवि उसमें देखने लगती हैं ।
यहाँ बात ज्यादा गहरी नहीं हैं,
बस ये हैं कि औरत को सिर्फ त्यागने का ही अधिकार हैं क्या???
उसको तो जैसे सबकुछ छोड़ना हैं ।

और पति को केवल पाने का ही अधिकार हैं क्या???
उसमें कुछ बदलाव नहीं आते
परन्तु औरत का मतलब सिर्फ और सिर्फ न्यौछावर ?
चलो, औरत की जिम्मेदारी हैं , कहकर ये बात भी तवज्जो से भरपूर कर देते हैं परन्तु अगर वहीं ईश्वर (पति) उसको नजरअंदाज करे, सबकी सुने पर उसको सुनना जरूरी ही ना समझे , सिर्फ इसलिए कि ये अब उसकी प्रॉपर्टी (व्यंग्यात्मक शब्द) हैं।
अब उसको ये भी सुकून हैं कि इसका सबकुछ तो मैं ही हूँ अब, मुझे छोड़कर ये कहीं नहीं जा सकती।
और दूसरी तरफ जिस घर में उसका
लालन -पालन हुआ , सबकुछ तो वहीं था ।
शादी बाद उधर का रवैया भी सोचने लायक हो जाता हैं कि अब पति का घर ही तुम्हारा घर हैं ।
मतलब एक औरत को सिर्फ त्याग की मूर्ति बनाकर पूज लो सब मिलकर और फिर उसका बलिदान कर दो ।
कम से कम ये तो सोचो कि वो भी चाहती हैं जिस इंसान को वो अपना सबकुछ मान रही हैं तो उसको भी वापसी अटेंशन मिले। ना कि उसको मात्र एक अबला औरत की नजर से देखे , कि तुम बस अब काम के लिए लाई गई सामान मात्र हो और चुपचाप घर का काम करके खुश रहो ।

कितनी घूटन, अकेलापन, तनाव … पता नहीं क्या -क्या चलता हैं एक औरत के दिमाग में ।

खैर… यहाँ समझेगा कौन? रीत हैं, वो तो यूं ही चलेगी ।
बदलाव तो होगा परन्तु आने वाली नई पीढ़ी द्वारा (जैसा कि इतिहास हमें यहीं सीखाता हैं कि जो गलतियाँ हुई उन्हें पुनः ना दोहराया जाए ।)तबतक होती रहेगी कई संस्कारों (व्यंग्यात्मक शब्द) की कुर्बानियाँ।

रंजना कुमारी वैष्णव

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